विचारधारा

एकात्म मानववाद

‘धर्म समाज को बनाता है’
एकात्म मानववाद, भारतीय जनता पार्टी के मार्गदर्शक निर्देशों में से एक है। एकात्म मानववाद को सबसे पहले पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने चार व्याख्यानों के रुप में 22 अप्रेल से 25 अप्रैल, 1965 के बीच बंबई में प्रस्तुत किया था।

एकात्म मानववाद – अध्याय 1

मुझे आज शाम से शुरु होने वाली बातचीत की श्रंखला में “एकात्म मानववाद” के विषय पर मेरे विचार रखने के लिए कहा गया। पिछली जनवरी को विजयवाड़ा में भारतीय जन संघ ने पार्टी की “सिद्धांत और नीतियां” के साथ ‘एकात्म मानववाद’ को भी स्वीकार किया गया। इस विषय पर यहां-वहां बिखरे तरीके से विचार विमर्श होता रहा है। यह जरुरी है कि हम एकात्म मानववाद के सभी पहलुओं पर विचार करें। तो जब तक देश अंग्रेजी राज के अधीन था, तब तक देश के सभी आंदोलनों और नीतियों का एक ही उद्देश्य था विदेशी शासको को बाहर निकाल कर स्वतंत्रता हासिल करना।

लेकिन स्वतंत्रता के बाद नए भारत का क्या चेहरा होगा ? हम किस दिशा में आगे बढेंगे ? इन विषयों पर निश्चित रुप से विचार किया गया। यह कहना सही नहीं होगा कि इस पहलु पर कोई विचार नहीं किया गया । ऐसे लोग थे जिन्होंने उस समय भी इन प्रश्नों पर विचार किया था। गांधीजी ने स्वंय अपनी पुस्तक “हिन्द स्वराज ” में स्वतंत्र भारत का अपना विचार रखा था। इससे पहले लोकमान्य तिलक ने अपनी पुस्तक “गीता रहस्य” में भारत के कायाकल्प के दार्शनिक आधार की चर्चा की थी। उन्होंने उस समय दुनिया में फैले विचारों पर तुलनात्मक चर्चा की थी।

इसके अलावा, कांग्रेस और दूसरे दलों ने समय-समय पर विभिन्न प्रस्तावों को अपनाया जिसमें इस विषय की चर्चा की गई थी। हालांकि इस विषय पर उससे ज्यादा अध्ययन किए जाने की जरुरत है जितना कि उस समय किया गया था। उस समय इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया क्योंकि हर किसी का मानना था कि अंग्रेजों को बाहर निकालने के बारे में सोचना ज्यादा जरुरी था और दूसरी बातों पर बाद में भी विचार किया जा सकता था। यह उचित नहीं लगता कि जब विदेशी शासन लागू हो तो आंतरिक विषयों पर समय व्यर्थ किया जाए। इसलिए भले ही विचारों में मतभेद हो, उन्हें कुछ समय के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

इसका परिणाम यहां तक हुआ कि जिनका विचार था की भविष्य के भारत के लिए समाजवाद को आधार बनाया जाना चाहिए, वे कांग्रेस के भीतर ही समाजवादी समूह के रुप में काम करते थे। उन्होंने अलग दल बनाने जैसा कुछ नहीं सोचा।

क्रांतिकारी भी, अपने तरीके से स्वतंत्रता के लिए काम कर रहे थे। हालांकि, सभी का इस बात पर सहमत थे, कि स्वतंत्रता हासिल करना सबसे महत्वपूर्ण काम था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, हमारे सामने स्वाभाविक रुप से यह प्रश्न उठता है कि हमारी प्रगति की दिशा क्या होगी ? लेकिन यह आश्चर्यजनक है कि इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया और आज स्वतंत्रता के 17 वर्ष बाद भी हम पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि कोई निश्चित दिशा तलाश की गई है।

भारत कहाँ पर

समय-समय पर , कांग्रेस या दूसरों ने अपने उद्देश्यों के अनुसार कल्याणकारी राज्य, समाजवाद, उदारवाद आदि की घोषणा कर चुके हैं। लेकिन ये आदर्शवादी नारे, नारों से हटकर दर्शन के लिए कम ही महत्व रखते हैं। मैं ऐसा व्यक्तिगत विचार विमर्श के आधार पर कह रहा हूँ। एक प्रमुख सज्जन व्यक्ति ने एक विमर्श के दौरान कांग्रेस के विरुद्ध साझा मोर्चा बनाने का सुझाव दिया , जिससे की कांग्रेस को तगड़ी टक्कर दी जा सके। आजकल राजनैतिक दल इस रणनीति को अपनाते हैं। इसलिए, इस तरह के विचार का आगे आना आश्चर्यजनक था। हालांकि, मैंने स्वाभाविक रुप से पूछा, “हम क्या कार्यक्रम अपनाएंगें? अगर इस तरह का साझा मोर्चा बनता है तो कार्यक्रमों के बारे में कुछ जानकारी बहुत जरुरी होगी। हमारी आर्थिक नीति क्या होगी? हमारी विदेश नीति क्या होगी? इन प्रश्नों पर भी मोट तौर पर विचार रखा जाना चाहिए। ”

“इसके बारे में चिन्ता ना करें। आप जो चाहें उसे स्वीकार कर सकते हैं। हम समर्थन के लिए तैयार हैं, चरम मार्क्सवाद से लेकर पूंजीवाद तक कुछ भी।” उत्तर इस तरह से आया जैसे यह बहुत सामान्य था। उन्हें किसी भी कार्यक्रम को स्वीकार करने में आपत्ति नहीं थी। सिर्फ एक ही लक्ष्य था कि किसी तरह कांग्रेस को हराया जाना चाहिए। यहां तक की अब भी कुछ लोग कहते हैं कि कांग्रेस को हराया जाना चाहिए भले ही साम्यवादियों या दूसरों के सहयोग के साथ।

हाल ही में केरल में चुनाव हुए। चुनाव के समय साम्यवादी, मुस्लिम लीग, स्वतंत्रता पार्टी, एस.एस.पी. विद्रोही कांग्रेस जिसे केरल कांग्रेस के नाम से भी जाना गया, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी आदि ने कई सारे द्विपक्षीय गठबन्धन बनाए। इसका नतीजा यह हुआ कि यह मानना बहुत मुश्किल था कि इन दलों की कोई निश्चित विचारधारा, सिद्धांत और उद्देश्य भी है। जहां तक सिद्धांतों की बात है यह स्थिति है।

कांग्रेस भी, इसी तरह की स्थिति में है। हालांकि कांग्रेस ने लोकतांत्रिक समाजवाद को अपना लक्ष्य घोषित किया है, कांग्रेस के बहुत से नेताओं के व्यवहार से एक चीज साफ तौर पर दिखाई देती है कि उनका कोई निश्चित सिद्धांत नहीं है, कांग्रेस में एकतरफा सोच नहीं है। कांग्रेस में साम्यवाद के घोर समर्थक भी हैं। यहां ऐसे भी लोग हैं जो पूंजीवाद में भरोसा रखते हैं और साम्यवाद के कट्टर विरोधी हैं। कांग्रेस के मंच पर हर तरह के लोग हैं। अगर कोई जादुई पिटारा हो सकता है जिसमें कोबरा और नेवला साथ रह सकते हैं तो यह कांग्रेस है।

हमें विचार करना चाहिए कि क्या हम ऐसी स्थितियों में विकास कर सकते हैं। अगर हम ठहरकर देश के सामने आ रही समस्याओं के कारणों का विश्लेषण करें तो हमें पता चलेगा कि लक्ष्यों और दिशा को लेकर हमारी भ्रम की स्थिति इसका सबसे बड़ा कारण है। मुझे एहसास है कि भारत से सभी 45करोड़ लोग सभी प्रश्नों या यहां तक की एक प्रश्न पर भी सहमत नहीं हो सकते। यह किसी भी देश में संभव नहीं है। फिर भी, सामान्यत किसी भी देश के लोगों की ज्यादा हो या कम एक आम इच्छा होती है। अगर इस लोकप्रिय आकांक्षा को हमारे उद्देश्यों का आधार बनाया जाता है तो आम आदमी सोचता है कि देश सही दिशा में आगे बढ़ रहा है, और उसकी खुद की आकांक्षा देश के प्रयासों में परिलक्षित होती है।

इससे एकता की अधिकतम संभव भावना उत्पन्न होती है। इस कथन की सच्चाई अक्टूबर/नवम्बर में चीन के आक्रमण के समय लोगों की प्रतिक्रिया में दिखाई दी। पूरे देश में एक उत्साह की लहर थी। कार्यवाही और बलिदान, दोनों प्रचुर मात्रा में थे। सरकार और आम जनता या विभिन्न राजनैतिक दलों में कोई अंतर नहीं था। यह कैसे संभव हुआ? बाहरी खतरे ने हमें खुद को पहचानने का अवसर दिया। सरकार ने जो नीति अपनाई उसमें लोगों में फैली व्यापक भावना दिखाई दी और जिसने उनकी बलिदान की भावना के साथ आत्म-सम्मान को बढ़ाया। इसका परिणाम था कि हम एकजुट होकर खडे रहे।

हमारी समस्याओं का मूल- स्वंय की उपेक्षा

यह बहुत जरुरी है कि हम अपनी राष्ट्रीय पहचान के बारे में सोचें। इस पहचान के बिना ना तो स्वतंत्रता का कोई मतलब न है, और ना ही स्वतंत्रता विकास और खुशी का साधन बन सकती है। जब तक हम अपनी राष्ट्रीय पहचान से अनजान रहेंगें, हम हमारी सभी क्षमताओं की पहचान और उनका विकास नहीं कर सकते। विदेशी राज में इस पहचान को दबाया गया। इसीलिए राष्ट्र स्वतंत्र रहना चाहते हैं जिससे वे उनके प्राकृतिक झुकाव के अनुरुप विकास कर सकें और उनके प्रयासों में खुशी का अनुभव कर सकें। प्रकृति ताकतवर है। प्रकृति के विरुद्ध जाने का प्रयास या उसका अपमान समस्याओं को निमंत्रण देता है।

प्राकृतिक सहज ज्ञान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता लेकिन यह संभव है कि इस प्रकृति को संस्कृति के स्तर तक उठा दिया जाए। मनोविज्ञान हमें बताता है कि प्राकृतिक सहज ज्ञान को दबाने से किस तरह अलग-अलग मानसिक रोग हो सकते हैं। इस तरह का व्यक्ति बैचेन और उदास रहता है। धीरे –धीरे उसकी क्षमता घटने लगती है और वह विकृत हो जाता है। राष्ट्र भी व्यक्ति की तरह है जब उसके प्राकृतिक सहज ज्ञान को नजरअंदाज किया जाता है तो वह कई तरह की बिमारियों का शिकार बनता है। भारत के सामने प्रमुख समस्या है अपनी राष्ट्रीय पहचान की अवहेलना।

अवसरवादिता के कारण राजनीति में लोगों का विश्वास हिल गया है

वे अधिकांश लोग जो इस राष्ट्र को आज चला रहे हैं या वे जो देश के मामलों में सक्रिय रुचि रखते हैं , इस मूल कारण से अनभिज्ञ हैं। नतीजतन बिना किसी सिद्धांत वाले लोग हमारे देश की राजनीति को चलाते हैं। दलों और राजनेताओं के पास ना तो सिद्धांत है ना ही उद्देश्य और ना आचरण का मानक तरीका। लोगों को एक दल को छोड़कर दूसरे में शामिल होने में कुछ भी गलत नहीं लगता। यहां तक की दलों के गठबंधन और विलय या उनका अलग होना किसी समझौते या सिद्धान्तों में मतभेद के कारण नहीं बल्कि पूरी तरह से चुनावी फायदों या सत्ता में स्थान पाने को लेकर होता है। 1939 में श्री हाफिज मोहम्मद इब्राहिम मुस्लिम लीग के टिकट पर चुने गए।

बाद में जब वे कांग्रेस में शामिल हुए तो सार्वजनिक आचरण के स्वस्थ सिद्धांतो का अनुमोदन करते हुए उन्होंने त्यागपत्र दिया और कांग्रेस के टिकट पर फिर से चुनाव की मांग की और फिर से चुने गए। 1948 में जब समाजवादियों ने कांग्रेस को छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी बनाई, तो विधायिका का सदस्य रहे सभी लोगों ने त्यागपत्र देकर सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर फिर से चुनाव लड़ा। लेकिन उसके बाद इस स्वस्थ परम्परा को भुला दिया गया। अब राजनीति में पूरी स्वच्छंदता है। नतीजतन, जनता के मन में प्रत्येक के लिए अविश्वास है। शायद ही कोई होगा जिसकी ईमानदारी जनता की नजर में संदेह से परे हो। इस स्थिति को बदलना चाहिए। अन्यथा, एकता और अनुशासन नहीं रह सकता।

हमारी दिशा क्या होनी चाहिए ?

राष्ट्र दोराहे पर खड़ा है। कुछ लोग सुझाव देते हैं कि हमें वहीं से शुरुआत करनी चाहिए जहां हमने एक हजार पहले छोड़ा था, जब विदेशी आक्रांताओं ने हमारी जिंदगी को बाधित किया था। लेकिन राष्ट्र कपड़े की तरह कोई निर्जीव वस्तु नहीं है कि कुछ समय के बाद फिर से बुनाई शुरु कर दी जाए। इसके अलावा यह कहना कि हजार साल पुराने विदेशी शासन ने हमारी राष्ट्र की जिंदगी को इस हद तक बाधित कर दिया है कि उस समय से लेकर आज के दिन तक हम अप्रगतिशील और निष्क्रिय बने रहे तर्कसंगत नहीं होगा। बदलती परिस्थितियों में राष्ट्र के सामने आ रही चुनौतियों का सामना करने के लिए निश्चित रुप से राष्ट्र ने अपने सर्वश्रेष्ठ लोगों को लगाया है।

हमने अपनी जिंदगी को आगे ले जाने और विदेशियों से स्वतंत्रता हासिल करने के लिए बहुत संघर्ष किया है। हमारे राष्ट्रीय जीवन का प्रवाह रुका नहीं बल्कि निरंतर चलता रहा था। गंगा के पानी को उलट कर पीछे के किसी स्थान तक ले जाना बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं होगा। हो सकता है कि बनारस में गंगा उतनी शुद्ध ना हो जितनी की हरिद्वार में। लेकिन फिर भी यह वही पवित्र गंगा है। इसने बहुत से नालों को उनके अवशिष्ट के साथ अवशोषित किया है। हालांकि, इनका कोई अलग अस्तित्व नहीं है बल्कि ये गंगा ही बन गए हैं। वर्तमान गंगा अपरिहार्य रुप से उज्जवल रहनी चाहिए। यदि यह सब हुआ होता यह अभी भी बड़ी समस्या नहीं होती। लेकिन विश्व में दूसरे देश भी हैं।

उन्होंने पिछले एक हजार वर्षों में अभूतपूर्व प्रगति की है। हमारा पूरा ध्यान स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने या आक्रमणकारियों के नए गिरोहों को दूर रखने में लगा रहा। हम विश्व की प्रगति में योगदान करने में सक्षम नहीं रहे। अब जबकि हम आज़ाद हैं, क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम जल्द से जल्द इस कमी की भरपाई करें और विश्व के विकसित राष्ट्रों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हों ?
इस बिन्दु तक कोई मतभेद नहीं है। मुश्किल तब पैदा होती है जब हम पश्चिम की अभूतपूर्व प्रगति, इसके वास्तविक और अवास्तविक प्रभावों के कारणों को पहचानने में विफल होते हैं। इस तथ्य से स्थिति और भी जटिल हो जाती है कि अंग्रेजों, और पश्चिम के प्रतिनिधियों ने इस देश पर शताब्दियों तक राज किया, और इस दौरान इस तरह के कदम उठाए कि हमारे लोगों के दिमाग में धीरे-धीरे भारतीय चीजों के लिए अवमानना और पश्चिम की हर चीज के लिए सम्मान का भाव भी पैदा किया।
वैज्ञानिक उन्नति के साथ ही, उनका जीवन जीने का तरीका, शिष्टाचार, खाने की आदतें आदि सब इस देश में आईं। ना केवल भौतिक विज्ञान बल्कि उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक सिद्धांत भी हमारे मानक बन गए। आज इस देश के पढ़े लिखे लोगों में इसका प्रभाव साफ दिखाई देता है। हमें तय करना होगा कि यह प्रभाव हमारे लिए अच्छा है या बुरा। अंग्रेजों के शासन के समय उनकी चीजों का बहिष्कार करने में हमें गर्व महसूस होता था, लेकिन आश्चर्य है कि अब अंग्रेज जा चुके हैं तो पाश्चात्यकरण प्रगति का प्रयाय बन चुका है। यह सही है कि राष्ट्रवाद की संकीर्ण भावना को राष्ट्र की प्रगति में बाधा डालने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
हालांकि पश्चिम का विज्ञान और पश्चिमी रहन सहन दोनों अलग-अलग बातें हैं। जहां पश्चिमी विज्ञान सार्वभौमिक है और अगर हम आगे बढ़ना चाहते हैं तो इसे हमें स्वीकार करना चाहिए, लेकिन यही बात जीवन जीने के पश्चिमी तरीके और मूल्यों के बारे में सही नहीं है। असल में पश्चिम की विचारहीन नकल को पूरी तरह से खारिज किया जाना चाहिए। ऐसे लोग हैं जो पश्चिम के आर्थिक और राजनैतिक सिद्धांतों को प्रगति का प्रतीक मानते हैं और इसी को हमारे देश में भी लागू करने की इच्छा रखते हैं। इसलिए जब हम यह निर्धारित करने की कोशिश कर रहे हैं कि हम अपने देश को कहां और कैसे ले जाना चाहते हैं तो हमें पश्चिम के विभिन्न आर्थिक और राजनैतिक सिद्धांतों के आधार और उनकी वर्तमान स्थिति को भी ध्यान में रखना चाहिए।

यूरोपीय राष्ट्रों का उदय

विभिन्न तरह के वाद जिन्होंने पश्चिम को प्रभावित किया, उसमें से राष्ट्रवाद, लोकतंत्र और समाजवाद प्रमुख हैं। इसी समय कुछ लोग थे जिन्होंने वैश्विक एकता और वैश्विक शांति को बढ़ावा दिया और इस दिशा में कुछ प्रयास किए।

इनमें से, राष्ट्रवाद सबसे पुराना और सबसे मज़बूत विचार है। रोमन साम्राज्य के पतन और कैथोलिक चर्च के प्रभाव में कमी के बाद, यूरोप में कई देशों का उदय हुआ। यूरोप का पिछले कुछ हजार वर्षों का इतिहास कई देशों के उदय और उनके बीच संघर्ष का इतिहास रहा है। इन देशों ने यूरोपीय महाद्वीप की सीमा से बाहर अपने सम्राज्य को फैलाया और दूसरे स्वतंत्र राष्ट्रों को अपने अधीन किया। राष्ट्रवाद राष्ट्र और राज्य को साथ लाया जिससे राष्ट्र राज्यों का उदय हुआ। ठीक इसी समय रोमन कैथोलिक चर्चों के प्रभाव में कमी आने के कारण या तो राष्ट्रीय चर्चों को बढ़ावा मिला या फिर राजनीति से धर्म का प्रभाव पूरी तरह से खत्म हो गया। धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा इसी स्थिति से उत्पन्न हुई।

यूरोप में लोकतंत्र का उद्भव

लोकतंत्र एक क्रान्तिकारी विचार था जिसने यूरोप के राजनैतिक जीवन पर गहरा असर डाला। शुरुआत में, प्रत्येक राष्ट्र का एक राजा होता था जो उसका मुखिया होता था लेकिन धीरे-धीरे लोगों के मन में राजशाही की निरकुंशता के खिलाफ जाग्रति आई। औद्योगिक क्रांति और वैश्विक व्यापार ने सभी देशों में व्यापारिक समुदाय को बढ़ाने में योगदान दिया। स्वाभाविक रुप से शक्ति के नए केन्द्रों और स्थापित राजाओं और सामन्तों के बीच संघर्ष शुरु हुआ। इस संघर्ष ने, ‘लोकतंत्र’ को अपना दार्शनिक आधार बनाया। यूनानी शहरों के गणतंत्रों में लोकतंत्र की उत्पत्ति को देखा जा सकता है। आम आदमी प्रत्येक नागरिक की समानता, बंधुत्व और स्वतंत्रता के ऊँचे आदर्शों की तरफ आकर्षित हुआ। फ्रांस खूनी क्रांति का गवाह बना।

इंग्लैंड में भी, समय-समय पर आंदोलन होते रहे। लोकतंत्र के विचार ने आम आदमी के दिमाग में जगह बना ली थी। राजशाही को या तो खत्म कर दिया गया या उनकी शक्तियों में बेहिसाब कटौती की गई और संवैधानिक सरकारों की स्थापना की गई। आज यूरोप में लोकतंत्र पहले से ही स्वीकार किया जा चुका है। यहां तक की जिन लोगों ने लोकतंत्र को दबाया वे भी इसकी निंदा नहीं करते। हिटलर, मुसोलिनी और स्टालिन जैसे तानाशाहों ने भी लोकतंत्र पर कुछ नहीं कहा।

व्यक्तियों का शोषण

लोकतंत्र में हर व्यक्ति को एक वोट का अधिकार मिला। लेकिन वास्तविक सत्ता उन लोगों के पास रही जिन्होंने क्रांति का नेतृत्व किया। औद्योगिक क्रान्ति ने उत्पादन के नए तरीकों में भरोसा पैदा किया। घर पर काम करने की स्वतंत्रता की जगह कामगारों ने कारखाना मालिकों के आदेश पर कारखानों में काम करना शुरु कर दिया था, कामगार अपने गृहनगर को छोड़कर भीड़ भरे शहरों में रहने के लिए आए। वहां आवास की उचित व्यवस्था नहीं थी। कारखानों में कामगारों की रक्षा के लिए मुश्किल से ही कोई नियम थे। वे आर्थिक रुप से कमजोर होने के साथ ही अभी तक संगठित भी नहीं थे। वह शोषण, अन्याय और उत्पीड़न का शिकार बन गए। जिनके पास राजनैतिक सत्ता थी वे लोग खुद उत्पीड़न करने वाले समूह में शामिल थे। इसलिए वहां स्थिति से बाहर आने की कोई उम्मीद नहीं थी।

बहुत से लोगों ने कामगारों की दशा सुधारने के लिए इस अन्याय के विरोध में आंदोलन किया। उन लोगों ने खुद को समाजवादी कहा। कार्लमार्क्स भी उनमें से ही एक था। इस अन्याय के खिलाफ आंदोलन की अगुआई करने के प्रयास में, उसने पूरे इतिहास और स्वरुप का अध्ययन करके स्थिति को लेकर अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया। उसने अपने सिद्धांतों को वैज्ञानिक आधार देने का दावा किया। बाद में आने वाले समाजवादी शायद मार्क्स से सहमत नहीं हों लेकिन वे सभी उसके विचारों से बडे पैमाने पर प्रभावित हुए।

सर्वहारा की तानाशाही

मार्क्स के विश्लेषण-द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के अनुसार, शोषण का मूल कारण, उत्पादन के साधनों के निजी स्वामित्व में निहित है। अगर इन साधनों को समाज की संपत्ति बना दिया जाए ( मार्क्सवाद के लिए, समाज राज्य का पर्याय है) तो फिर आगे कोई शोषण नहीं होगा। लेकिन इससे पहले, राज्य को शोषकों के हाथों से छुड़ाना चाहिए और इस बात को निश्चित किया जाना चाहिए की भविष्य में उनका प्रभाव नहीं रहे। इस दिशा में सर्वहारा की तानाशाही स्थापित की जानी चाहिए। लोग इस तानाशाही को स्वीकार करें, इसके लिए यह आदर्श स्थापित किया गया कि शोषक वर्ग के पूरी तरह से खात्मे के बाद और उसके पुनरुत्थान की बची संभावना में, राज्य एक वर्गविहीन , राज्यविहीन समाज के द्वारा प्रतिस्थापित किया जाएगा। मार्क्स ने यह दिखाने की कोशिश भी की कि पूंजीवाद में स्वंय के विनाश के बीज मौजूद हैं और समाजवाद अपरिहार्य है।

यूरोप के कुछ देशों में सामाजिक क्रांति हुई । यहां तक की, वहां भी समाजवाद को स्वीकार नहीं किया गया, राजनेताओं को कामगारों के अधिकारों को स्वीकार करना पड़ा। “कल्याणकारी राज्य” को आदर्श के रुप में स्वीकार किया गया। राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, समाजवाद या समानता ( समानता समाजवाद के मूल में मौजूद है; समानता समता से अलग है), इन तीन सिद्धांतों का यूरोप की सामाजिक राजनैतिक सोच पर प्रभुत्व रहा। इनके अलावा, वैश्विक शांति और वैश्विक एकता के आदर्श भी सामने आए। ये सभी अच्छे विचार हैं। ये मानव जाति की उच्च आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करते हैं। लेकिन अपने आप में हर सिद्धांत अधूरा है।

केवल इतना ही नहीं, व्यवहार में प्रत्येक सिद्धांत दूसरे के विरुद्ध है। राष्ट्रवाद वैश्विक शांति के लिए खतरा उत्पन्न करता है। लोकतंत्र और पूंजीवाद शोषण को खुली छूट देने के लिए हाथ मिला लेते हैं। समाजवाद ने पूंजीवाद का स्थान लिया और लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विरोध भी इसके साथ आया। इसलिए वर्तमान में पश्चिम के सामने इन अच्छे आदर्शों में सामंजस्य स्थापित करने की चुनौती है। इस काम में वे अभी तक सफल नहीं हुए हैं। उन्होंने एक या दूसरे आदर्श पर जोर देते हुए कई तरह के समूह बनाए।

इंग्लैंड ने राष्ट्रवाद और लोकतंत्र पर जोर दिया और इनके आधार पर उसके राजनैतिक-सामाजिक संस्थान खड़े किए, जबकि फ्रांस बिल्कुल इसी चीज को नहीं अपना पाया। वहां, लोकतंत्र के कारण राजनैतिक अस्थिरता पैदा हुई। ब्रिटिश लेबर पार्टी लोकतंत्र और समाजवाद में सामंजस्य करना चाहती थी लेकिन लोगों को इस बात पर संदेह था कि समाजवाद के ताकतवर होने पर लोकतंत्र बच पाएगा। इसलिए लेबर पार्टी समाजवाद का उतनी मजबूती से समर्थन नहीं करती जितना कि मार्क्सवाद का सिद्धांत करता है। अगर समाजवाद को बहुत कमजोर किए जाने पर , हिटलर और मुसोलिनी ने राष्ट्रवाद के साथ समाजवाद को अपनाया और लोकतंत्र को दफना दिया।

आखिर में समाजवाद उनके राष्ट्रवाद का औजार बन गया जिसने वैश्विक शांति और एकता के लिए बड़ा खतरा पैदा कर दिया। हम पश्चिम से कुछ मार्गदर्शन ले सकते हैं लेकिन तथ्य यह है कि उनके पास भी कोई ठोस सुझाव नहीं है। वे खुद दोराहे पर खड़े हैं और यह तय नहीं कर पा रहे कि क्या ठीक है। इस तरह की परिस्थिति में हम पश्चिम से मार्गदर्शन की उम्मीद नहीं कर सकते। इसके विपरीत हम इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या विश्व की इस वर्तमान परिस्थिति में हम इस दुविधा को हल करने के लिए कुछ कर सकते हैं। विश्व की प्रगति को ध्यान में रखते हुए, क्या हम जानकारी के आम संग्रह में कुछ जोड़ सकते हैं ?

विश्व समुदाय के सदस्य के रुप में, हमें अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना चाहिए। अगर हमारे पास ऐसा कुछ है जो विश्व की प्रगति में सहायक हो सकता है तो उसे विश्व के साथ बांटने में हमे संकोच नहीं करना चाहिए। मिलावट के इस युग में, विचारों में मिलावट की जगह इसके विपरीत जाकर हमें जहां भी संभव हो हमें उसकी जांच और उनको बेहतर बनाकर स्वीकार करना चाहिए। विश्व पर बोझ बनने की बजाए, अगर संभव हो तो हमें दुनिया की समस्याओं को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए।
हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि हमारी परम्परा और सभ्यता ने विश्व की संस्कृति को क्या योगदान दिया
है। हम इस पर कल शाम विचार करेंगे

एकात्म मानववाद – अध्याय 2

कल हमने देखा था कि आजादी के 17 वर्ष बाद भी , हमें अभी भी यह तय करना है कि हमारे देशवासियों के सर्वांगीण विकास के सपने को पूरा करने के लिए हमें कौनसी दिशा लेनी चाहिए। आमतौर पर लोग इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करने के लिए तैयार नहीं होते। वे केवल समय–समय पर उनके सामने आने वाले समस्याओं के बारे में ही सोचते हैं। कभी-कभी आर्थिक समस्याओं को चिंता के साथ देखा जाता है और उनको हल करने की कोशिश की जाती है, और बाकी के समय में सामाजिक और राजनैतिक समस्याएं ही आगे रहकर ध्यान खींचती हैं।

मौलिक रुप से यह पता नहीं होने पर कि हमें किस दिशा में जाना है, इस सभी प्रयासों में पर्याप्त उत्साह नहीं होता और ना ही इन प्रयासों में लगे लोगों में संतोष की भावना आती है। इन प्रयासों से उन नतीजों का एक छोटा हिस्सा ही हासिल हो पाता है जितना कि सही मायने में मिलना चाहिए।

आधुनिक बनाम प्राचीन

वे लोग जो किसी निश्चित दिशा की वकालत करते हैं उनमें दो अलग-अलग तरह के लोगों के समूह हैं। कुछ हैं जो सुझाव देते हैं कि हमें उसी स्थिति में वापस जाना चाहिए जब हमने स्वतंत्रता खोई थी और वहां से आगे बढ़ना चाहिए। दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं जो भारत में उत्पन्न हुई हर चीज को त्याग देना चाहते हैं और इसके बारे में सोचने के लिए भी तैयार नहीं हैं। उन्हें लगता है कि पश्चिमी जीवनशैली और विचार प्रगति का आखिरी उपाय है और अगर हमें विकास करना है तो इन सभी विचारों का यहां आयात किया जाना चाहिए। सोचने के दोनों ही नज़रिए गलत हैं , हालांकि उनमें आंशिक सच्चाई है और उन्हें पूरी तरह से त्याग देना उचित नहीं होगा।

वे लोग जो इस बात की वकालत करते हैं कि हमें वहीं से शुरु करना चाहिए जहां से हजारों वर्ष पहले हम छूटे थे, तो वे भूल जाते हैं कि यह योग्य हो भी सकता है और नहीं भी। पर यह निश्चित रुप से असंभव है। समय के बहाव को पलटा नहीं जा सकता।

अतीत को त्यागा नहीं जा सकता

पिछले एक हजार वर्षों में, हमने जो कुछ भी अपनाया, चाहे वह हम पर लादा गया हो या हमने इच्छा से अपनाया हो, इसे अब अस्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, हम भी अपने समाज के जीवन में नयापन लाए हैं, छोटा मोटा नहीं, चाहे जैसी भी चुनौतीपूर्ण स्थिति उत्पन्न हुई हो हम मात्र उसके मूकदर्शक नहीं बने रहे ; ना ही हमने हर विदेशी कार्रवाई पर प्रतिक्रिया दी। नयी स्थितियों का सामना करने के लिए जरुरत के अनुसार हमने अपनी जिंदगी को फिर से गढ़ने का भी प्रयास किया। इसलिए, पिछले एक हजार वर्षों में जो भी कुछ हुआ उसके प्रति आंखे बंद कर लेने से कुछ नहीं होगा।

विदेशी विचारधाराएं सार्वभौमिक नहीं हैं

इसी तरह जो लोग पश्चिमी विचारधाराओं को हमारी प्रगति का आधार बनाना चाहते हैं वे भूल जाते हैं कि ये विचारधाराएं विशेष परिस्थितियों और समय में पैदा हुई हैं। इनका सार्वभौमिक होना जरुरी नहीं है। वे खास लोगों और उनकी संस्कृति की सीमाओं से मुक्त नहीं हो सकती, जिन्होंने इन विचारों को जन्म दिया। मार्क्स के आदर्श बदलते समय और बदलती परिस्थितियों के साथ इस हद तक बदले हैं कि तोते की तरह हमारे देश के सामने आ रही समस्याओं के लिए मार्क्सवाद का प्रयोग करने से एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक की बजाए एक प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण पैदा होगा। यह जानकर सचमुच आश्चर्य होता है कि जो लोग मरी हुई परंपराओं को हटाकर समाज में परिवर्तन का दावा करते हैं वे खुद भी चलन से बाहर हो चुकी विदेशी परंपराओं को मानते हैं।

हमारा देश : हमारी समस्याएं

हर देश की अपनी अनूठी ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक स्थितियां होती हैं और उसकी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए, उसके नेता देश के सामने समय-समय पर आने वाली समस्याओं का निदान सुझाते हैं। यह मानना असंगत है कि एक देश के नेता ने अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए जिस निदान का उपयोग किया वह इसी तरह से दूसरे लोगों पर भी लागू हो जाएगी। एक साधारण सा उदाहरण पर्याप्त होता। हालांकि मानव में बुनियादी जैविक गतिविधि एक ही है फिर भी शायद जो दवाई इंग्लैंड में कारगर है जरुरी नहीं कि वह भारत में भी उतनी ही सहायक हो।

बिमारियां जलवायु, पानी, खाने-पीने की आदतों और परंपरा पर भी निर्भर करती हैं। हालांकि बाहरी लक्षण एक से दिखाई दे सकते हैं लेकिन जरुरी नहीं कि वही दवा सभी लोगों को ठीक कर दे। जो लोग सब रोगों में एक ही राम-बाण दवा का प्रयोग करते हैं उन्हें चिकित्सक की बजाए नीम-हकीम समझा जाना चाहिए। इसलिए आयुर्वेद कहता है कि हर जगह के रोग के लिए उस जगह के अनुरुप निदान तलाश करना चाहिए। इसलिए, विदेशी विचारधाराओं को मूल रुप में हमारे देश में अपनाना ना तो संभव है ना ही इसमें बुद्धिमानी है। इससे खुशी और समृद्धि प्राप्त करने में सहायता नहीं मिलेगी।

मानवीय ज्ञान साझा संपत्ति है

दूसरी तरफ, इस बात को समझने की आवश्यकता है कि जरुरी नहीं कि समय और स्थान के अनुसार कहीं उपजने वाले सभी विचार और आदर्श स्थानीय ही हों। बहुत से मामलों में किसी खास जगह, समय और सामाजिक वातावरण में मानवीय प्रतिक्रिया और किसी दूसरी जगह और समय पर उसके लोगों के साथ इस्तेमाल में शायद एक रिश्ता होता है। इसलिए दूसरे समाजों में हुए पिछले और वर्तमान विकास की पूरी तरह से अनदेखी करना निश्चित तौर से मूर्खतापूर्ण है।

इस घटनाओं में जो भी सच्चाई हो उसको स्वीकर करना चाहिए। बाकि को छोड़ दिया जाना चाहिए। दूसरे समाजों के ज्ञान को आत्मसात करते समय सही होगा कि हम उनकी गलतियों और विकृतियों का नहीं अपनाएं। यहां तक की उनके ज्ञान को भी हमारी खास परिस्थितियों के अनुकूलित किया जाना चाहिए। संक्षेप में, जहां तक शाश्वत सिद्धांतों और सत्यों की बात है हमें सम्पूर्ण मानवता के ज्ञान और लाभ को आत्मसात करना चाहिए। इनमें से जो हमारे बीच में उत्पन्न हुए हैं उन्हें स्पष्ट करके बदलते समय के अनुरुप ढालना होगा और जिन्हें हमने दूसरे समाजों से लिया है उन्हें अपनी परिस्थितियों के अनुरुप ढालना होगा।

विरोधाभासी विचार

पश्चिमी राजनैतिक सोच ने राष्ट्रवाद, लोकतंत्र और समाजवाद या समानता को आदर्श के तौर पर स्वीकार कर लिया है। इसके अतिरिक्त तब , वैश्विक एकता को बनाने के प्रयास किए गए जिससे “लीग ऑफ नेशन्स” का आकार सामने आया और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, “संयुक्त राष्ट्र संघ” बना। बहुत सारे कारणों की वजह से वे सफल नहीं हुए। हालांकि, ये निश्चित तौर पर उस दिशा में किए गए प्रयास थे।

व्यवहार में ये सभी आदर्श अधूरे और परस्पर विरोधी साबित हुए हैं।

राष्ट्रवाद देशों के बीच में संघर्ष को बढ़ाता है और उसके कारण वैश्विक संघर्ष बढ़ते हैं, जबकि यथास्थिति को विश्व शांति का प्रयाय माना जाए तो बहुत से छोटे राष्ट्रों की स्वतंत्र होने की आकांक्षा कभी पूरी नहीं होती। वैश्विक एकता और राष्ट्रवाद एक दूसरे के विरोधी हैं। कुछ लोग वैश्विक एकता के लिए राष्ट्रवाद को दबाने की बात कहते हैं जबकि दूसरे लोग वैश्विक एकता को काल्पनिक आदर्श मानते हैं और जोर देते हैं कि राष्ट्र का हित सर्वोपरि होना चाहिए।

इसी तरह की मुश्किल समाजवाद और लोकतंत्र के बीच सामन्जस्य बनाने में भी आती है। लोकतंत्र व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अनुमति देता है लेकिन ठीक इसी को पूंजीवाद के साथ मिलाकर शोषण और एकाधिकारवाद के लिए प्रयोग किया गया। समाजवाद को शोषण खत्म करने के लिए लाया गया लेकिन इसने व्यक्ति की स्वतंत्रता और सम्मान को खत्म कर दिया।

मानव जाति उलझन में है, वह यह तय करने में असमर्थ है कि भविष्य में प्रगति का सही रास्ता क्या है। पश्चिम पूरे विश्वास के साथ यह कहने की स्थिति में नहीं है कि सिर्फ यही इकलौता सही रास्ता है और दूसरा कोई नहीं। यह अपने आप में ज़बर्दस्ती छूने वाली बात है। इसलिए सीधे-सीधे पश्चिम का अनुसरण करने का मतलब होगा कि जैसे कोई दृष्टिहीन दूसरे दृष्टिहीन का नेतृत्व कर रहा है।

इस स्थिति में हमारा ध्यान भारतीय संस्कृति पर जाता है। क्या यह संभव है कि हमारी संस्कृति विश्व को रास्ता दिखा सके ?

राष्ट्र की दृष्टि से हमें हमारी संस्कृति पर विचार करना होगा क्योंकि यह हमारा ही स्वभाव है। स्वतंत्रता बहुत गहराई से किसी की खुद की संस्कृति से जुड़ी होती है। अगर संस्कृति स्वतंत्रता का आधार नहीं बनती है तब स्वतंत्रता के लिए चलाए गए राजनैतिक आंदोलन को स्वार्थी और सत्ता लोलुप लोग टुकड़ों में बदल देंगे। स्वतंत्रता तब ही सार्थक हो सकती है अगर यह हमारी संस्कृति की अभिव्यक्ति का साधन बने। इस तरह की अभिव्यक्ति ना केवल हमारे विकास में योगदान देगी बल्कि इसके लिए किए गए प्रयास से हमें आनंद की अनुभूति होगी।

इसलिए, राष्ट्र और मानवता दोनों ही नजरियों से यह जरुरी हो गया है कि हम भारतीय संस्कृति के आदर्शों के बारे में विचार करें। अगर इसके जरिए हम पश्चिमी राजनैतिक विचारों के विभिन्न आदर्शों में सामंजस्य कर पायें को यह हमारे लिए अतिरिक्त लाभ होगा। ये पश्चिमी आदर्श मानव विचार और सामाजिक संघर्ष में हुई क्रांति का उत्पाद हैं। ये मानव जाति की एक या दूसरी आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनकी अवहेलना करना उचित नहीं होगा।

भारतीय संस्कृति एकीकृत है

भारतीय संस्कृति की पहली विशेषता है कि यह जीवन को समग्र रुप से देखता है। इसका एक समग्र नजरिया है। हिस्सों के बारे में सोचना एक विशेषज्ञ के लिए सही हो सकता है लेकिन व्यावहारिक दृष्टिकोण से यह सही नहीं है। जीवन को हिस्सों में देखने और फिर उसको टुकड़ो के रुप में साथ जोड़ने की आदत के कारण ही पश्चिम में भ्रम की स्थिति पैदा होती है। हम यह स्वीकार करते हैं कि जीवन में विवधता और बहुलता है लेकिन हमने हमेशा उनके पीछे एकता को खोजने की कोशिश की। यह कोशिश पूरी तरह से वैज्ञानिक है।
वैज्ञानिक ब्रह्मांड को चला रहे आदर्शों को खोजने और उन आदर्शों के आधार पर व्यावहारिक नियम बनाने के लिए हमेशा ब्रह्मांड की अव्यवस्था में व्यवस्था तलाश करने की कोशिश करते हैं। रसायनशास्त्रियों ने खोजा कि कुछ तत्व मिलकर पूरे भौतिक जगत का निर्माण करते हैं। भौतिक शास्त्र ने इससे भी एक कदम जाकर दिखाया कि इन तत्वों भी केवल ऊर्जा से बने है। आज हम जानते हैं कि पूरा ब्रह्मांड केवल ऊर्जा से बना है।

दार्शनिक भी मूल रुप से वैज्ञानिक हैं। पश्चिमी दार्शनिक द्वैतवाद के सिद्धांत तक पहुंच गए; हेगल ने थीसिस, एंटी थीसिस और सिन्थिसिस के सिद्धांत को सामने रखा; कार्ल मार्क्स ने इस सिद्धांत को आधार बनाकर अपना इतिहास और अर्थव्यवस्था का विश्लेषण प्रस्तुत किया। डार्विन ने जीवन का एकमात्र आधार योग्यतम की उत्तरजीविता के सिद्धांत को माना। लेकिन इस देश में हमने सभी तरह के जीवन में आधारभूत एकता को देखा।

यहां तक की द्वैतवादी भी मान चुके हैं कि प्रकृति और आत्मा एक दूसरे के परस्पर विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। जीवन में विविधता मात्र आंतरिक एकता की अभिव्यक्ति है। वहां विविधता अंतर्निहित पूरक है। बीज कई तरीके से अभिव्यक्ति पाता है- पेड़ के जड़,तना,टहनियां,पत्ते,फूल, और फल के रुप में। इन सभी का रुप और रंग विभिन्न है और कुछ हद तक गुण भी अलग हैं। फिर भी हम बीज के जरिए उनमें एक दूसरे से एकता का भाव देखते हैं।

परस्पर संघर्ष – सांस्कृतिक प्रतिगमन के चिन्ह

विविधता और विभिन्न रुपों में एकता की अभिव्यक्ति अभी भी भारतीय संस्कृति का केन्द्रीय विचार है। अगर इस सच्चाई को पूरे दिल से स्वीकार किया जाए विभिन्न ताकतों के बीच किसी तरह का संघर्ष नहीं रहेगा। संघर्ष प्रकृति की संस्कृति का संकेत नहीं है: बल्कि यह उसकी गिरावट का संकेत है। जंगल का कानून, “योग्यतम की उत्तरजीविता” के जिस सिद्धांत को पश्चिम ने हाल ही में खोजा है वह हमारे दार्शनिकों को पहले से ही पता था।

हमने मानव की छ: निम्न श्रेणी की प्रवृत्तियों जैसे इच्छा, गुस्सा आदि की पहचान कर ली थी, लेकिन हमने उनको संस्कृति या सभ्य जीवन के आधार के रुप में इस्तेमाल नहीं किया। हमारे समाज में चोर और डाकू हैं। अपनेआप को और समाज को इन तत्वों से बचाना बहुत जरुरी है। हम उनको अपना आदर्श या मानव व्यवहार के मानक के रुप में स्वीकार नहीं कर सकते। “योग्यतम की उत्तरजीविता” जंगल का कानून है। सभ्यता इस कानून के आधार पर विकसित नहीं हुई बल्कि इस समझ के आधार पर हुई कि कैसे मानव जीवन में इस कानून का कम से कम प्रयोग किया जाए। अगर हम तरक्की करना चाहते हैं तो हमें सभ्यता के इस इतिहास को हमारे दिमाग से बाहर निकालना होगा।

आपसी सहयोग

संघर्ष और प्रतियोगिता की तरह इस दुनिया में सहयोग भी प्रचुर मात्रा में है। वनस्पति और जन्तु जगत एक दूसरे को जिंदा रखते हैं। हमें वनस्पतियों से ऑक्सीजन मिलती है जबकि हम वनस्पतियों के विकास के लिए जरुरी कार्बन-डाई-ऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं। यह आपसी सहयोग पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखता है।

जीवन के विभिन्न रुपों के बीच आपसी सहयोग के इस तत्व की मान्यता और उसे समझकर पारस्परिक रुप से मानव जीवन को बनाए रखने का प्रयास सभ्यता का प्रमुख लक्षण है। सामाजिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए प्रकृति को मोड़ना संस्कृति है लेकिन जब यह प्रकृति सामाजिक संघर्ष में बदल जाए तो उसे विकृति कहते हैं। संस्कृति प्रकृति का अनादर या उसको अस्वीकार नहीं करती।

बल्कि यह प्रकृति के उन तत्वों को आगे बढ़ाता है जो इस ब्रह्मांड में जीवन को बचाए रखकर इसे बेहतर बनाते हैं और जीवन में बाधा पहुंचाने या नष्ट करने वाले तत्व को रोकता है। चलिए एक साधारण सा उदाहरण लेते हैं। भाई, बहन, मां और बेटा, पिता और बेटा जैसे रिश्ते प्राकृतिक हैं। ये मानव और पशु दोनों में एक ही तरह से हैं। जैसे दो भाई एक मां के बेटे होते हैं उसी तरह दो बछड़े की एक गाय मां होती है। तो अंतर कहां है? पशुओं में स्मृति की कमी होती है इसलिए रिश्ते कम समय के लिए रहते हैं।
वे इन रिश्तों की बुनियाद पर सभ्यता का निर्माण नहीं कर सकते। लेकिन मानव इस प्राकृतिक रिश्तों के आधार पर जीवन को अधिक व्यवस्थित बनाता है। इस रिश्तों के जरिए दूसरे रिश्ते बनाता है जिससे पूरा समाज एक सूत्र में बंध जाता है। इस तरह से अलग-अलग मूल्य और परम्पराएं बनती हैं। अच्छे और बुरे के मानक भी उसी अनुरुप बनाए जाते हैं। समाज में हम भाईयों के बीच स्नेह और शत्रुता दोनों ही पाते हैं। लेकिन स्नेह को अच्छा मानते हैं और कोशिश करते हैं कि भाईयों का रिश्ता स्नेहपूर्ण बना रहे। विरोधी प्रवृत्ति को स्वीकार नहीं किया जाता। अगर संघर्ष और दुश्मनी को मानव संबंधों का आधार बना लिया गया और फिर उसके आधार पर इतिहास का मूल्यांकन किया गया तो इसके बाद विश्व शान्ति की बात करना बेमानी होगा।

एक मां अपने बच्चों को बड़ा करती है। मां के प्यार को सबसे ऊंचा दर्जा दिया जाता है। सिर्फ इसके आधार पर ही हम मानवजाति को नियंत्रित करने वाले नियम बना सकते हैं। कभी-कभी बच्चे को लेकर मां की क्रूरता और स्वार्थ के उदाहरण भी सामने आते हैं। जानवरों की कुछ जातियों में मां भूख को शांत करने के लिए अपनी संतान को छोड़ देती है। दूसरी तरफ बंदर हैं जिनमें मां बच्चे के मरने के बाद भी उसे चिपकाए रखती है। जीवित लोगों में दोनों तरह का व्यवहार पाया जाता है। इस दोनों में से प्रकृति के किस नियम को सभ्य जीवन का आधार बनाया जा सकता है? हम कह सकते हैं कि जो जीवन को बचाए उसे ही चुना जाना चाहिए , इसके विपरीत नियम से सभ्य जीवन नहीं चलाया जा सकता।

मानव प्रकृति में एक तरफ क्रोध और लालच तो दूसरी तरफ प्यार और त्याग, दोनों ही प्रवृत्तियां होती हैं। ये सभी हमारी प्रकृति में मौजूद हैं। क्रोध आदमी और जानवर दोनों में होता है। अगर हम क्रोध को हमारी जिंदगी का मानक बनाते हैं और उसके अनुसार अपने प्रयास करते हैं तो परिणामस्वरूप जीवन में सामंजस्य में कमी आएगी। इसलिए उपदेश कहता है, “क्रोध को पैदा मत करो”। यहां तक की जब किसी के दिमाग में क्रोध आता है तो व्यक्ति उस पर काबू कर सकता है और उसे करना भी चाहिए। इस वजह से नियंत्रण हमारी जिंदगी का हिस्सा बनेगा क्रोध नहीं।

इस तरह के कानूनों को नैतिकता के सिद्धांत के रुप में जाना जाता है। इस सिद्धांतो को किसी के द्वारा तैयार नहीं किया गया। उन्हें खोजा गया। गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत में इसकी समानता तलाशी जा सकती है कि अगर हम कोई पत्थर उछालते हैं तो अंतत वह जमीन पर ही गिरेगा। गुरुत्वाकर्षण के नियम को न्यूटन ने नहीं बनाया। उन्होंने इसकी खोज की। जब उन्होंने पेड़ से एक सेब को जमीन पर गिरते देखा तो उन्होंने महसूस किया कि ऐसा कोई नियम होना चाहिए। इसतरह उन्होंने यह नियम खोजा, उन्होंने इसे बनाया नहीं।इसी तरह मानव संबंध के कुछ नियम हैं जैसे कि, अगर किसी को गुस्सा आता है तो यह पूरी मानवजाति के भले के लिए है कि गुस्से पर काबू किया जाए। इस तरह नैतिकता के नियम खोजे गए।

“दूसरो से झूठ मत बोलो, वही कहो जो सच है”। यह एक नियम है। जीवन के हर कदम पर इसकी उपयोगिता दिखाई देती है। हम सच्चे लोगों को पसंद करते हैं। अगर हम झूठ बोलते हैं तो हम खुद बुरा महसूस करते हैं; जिंदगी ऐसे नहीं चल सकती; इस तरह तो बड़ी दुविधा खड़ी हो जाएगी।
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इन नियमों से हमारा धर्म बनता है

एक बच्चा स्वभाव से झूठ नहीं बोलता। ज्यादातर, अभिभावक अपने बच्चे को झूठ बोलना सिखाते हैं। अगर बच्चा किसी चीज की इच्छा करता है और अगर अभिभावक नहीं चाहते कि बच्चा वह चीज ले तो वे उस चीज को छिपा देते हैं और बच्चे को बताते हैं कि चीज खो गई। बच्चे को शायद कुछ समय के लिए मूर्ख बनाया जा सकता है लेकिन जल्दी ही उसे सही स्थिति का पता लग जाता है और वह झूठ बोलना सीख लेता है।

स्वभाव से हर इंसान सच्चा होता है इस नियम की खोज की गई थी,यह एक तथ्य है । नैतिकता के बहुत से दूसरे नियमों को भी इसी तरह खोजा गया। इन्हें किसी ने मनमाने तरीके से नहीं बनाया। भारत में इन नियमों को “धर्म” कहा जाता है, जीवन का कानून। वे सभी नियम जो मानवजीवन में सद्भाव, शांति और प्रगति लाते हैं “धर्म” में शामिल हैं। धर्म की मजबूत आधार पर ही हमें जीवन का पूर्ण विश्लेषण करना चाहिए।

प्रकृति धर्म के नियम के अनुसार ही ढली है। हमारे पास सभ्यता और संस्कृति है। सचमुच यही सभ्यता है जो हमें मानव जाति के जीवन को बनाए रखने और उसको निर्मल बनाने का काम करती है। “धर्म” को यहां कानून माना गया है। अंग्रेजी का ‘रिलीजन’ (religion) शब्द धर्म का सही पर्याय नहीं है।

हम ना केवल सामूहिक या सामाजिक जीवन में बल्कि निजी जीवन में भी जीवन को एकीकृत रुप में लेते हैं। सामान्यत किसी व्यक्ति को एक भौतिक शरीर समझा जाता है। शारीरिक आराम और विलासिता को खुशी का रुप माना जाता है। लेकिन हम जानते हैं कि दिमागी चिंता के कारण शारीरिक खुशी खत्म हो जाती है। हर कोई शारीरिक आराम चाहता है। लेकिन अगर किसी को जेल में डाल दिया जाए और वहां पर उसका सबसे बेहतर भोजन आदि दिया जाए तो क्या वह खुश होगा ? किसी व्यक्ति को अगर अच्छे भोजन के साथ गालियां भी दी जाएं तो उसे भोजन करने में खुशी महसूस नहीं होगी। महाभारत का एक प्रसंग है।

जब भगवान कृष्ण पांडवों के दूत बनकर हस्तिनापुर गए तो दुर्योधन ने उनको अपने आतिथ्य का आनंद लेने के लिए आमंत्रित किया। भगवान कृष्ण ने उसका निमंत्रण ठुकरा दिया और उसकी जगह विदुर के घर चले गए। इतने श्रद्धेय मेहमान को घर पर देखकर विदुर की पत्नी ने खुशी में उनको केले के छिलके खाने के लिए देकर केले के फल को फेंक दिया। लेकिन भगवान कृष्ण ने उस केले के छिलके को भी आनंद से खाया। इसलिए कहा जाता है, “गरिमा और स्नेह के साथ परोसा गया साधारण भोजन भी अनादर से परोसे गए व्यंजनो से बेहतर है”। इसलिए जरुरी है कि मानसिक खुशी को समझा जाए।

इसी तरह एक बौद्धिक खुशी होती है जिसे भी ध्यान में जरुर रखना चाहिए। यहां तक की किसी व्यक्ति को शरीर के सुख और महत्व, स्नेह आदि मिले तो भी मन को किससे बात से खुशी मिलेगी। अगर वह किसी बौद्धिक भ्रांति से घिरा है तो वह लगभग पागलपन जैसी स्थिति में चला जाता है। और पागलपन खुद में है क्या ? एक पागल के पास सभी भौतिक सुख हो सकते है, वह पूर्ण स्वस्थ हो सकता है और उसके परिवारजन उसकी पूरी देखभाल भी करते होगें; लेकिन उसके पास बौद्धिक खुशी नहीं होगी। बौद्धिक खुशी भी आवश्यक और महत्वपूर्ण है। हमे इन सब चीजों को भी ध्यान में रखना होगा।

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मनुष्य की राजनैतिक आकांक्षाएं

शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा। ये चारों मिलकर किसी व्यक्ति को बनाते हैं। लेकिन ये आपस में मिले हुए हैं। हम किसी हिस्से के बारे में अलग से नहीं सोच सकते। पश्चिम में भ्रम की स्थिति पैदा होने का कारण यह है कि उन्होंने ऊपर बताए गए चारों पहलुओं को अलग-अलग और एक दूसरे से किसी संबंध के बिना समझा। जब वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आंदोलन हो रहा था, उन्होंने घोषणा कि “मनुष्य राजनैतिक प्राणी है” और इसलिए उसकी राजनैतिक आकांक्षाओं को भी समझा जाना चाहिए। केवल एक व्यक्ति को ही राजा और दूसरों को उसकी प्रजा क्यों होना चाहिए ? प्रत्येक को शासन में हिस्सा दो ! इस राजनैतिक व्यक्ति को संतुष्ट करने के लिए उन्होंने उसे वोट का अधिकार दे दिया।

अब उसको वोट देने का अधिकार मिल गया, लेकिन उसी समय दूसरे अधिकार में कमी आ गई। तब प्रश्न उठता है। “वोट का अधिकार तो अच्छी बात है लेकिन भोजन का क्या ? अगर कुछ खाने को नहीं होगा तो क्या होगा” ?

वे आश्चर्यचकित थे, “अब तुम्हारे पर वोट का अधिकार है, तुम राजा हो। तुम्हें चिंता करने की क्या जरुरत?”

लेकिन आदमी ने उत्तर दिया, “अगर मुझे भोजन ही नहीं मिलेगा तो मैं इस राज्य का क्या करूँगा? मेरे वोट का अधिकार का कोई उपयोग नहीं है। मैं पहले रोटी चाहता हूँ। तब कार्ल मार्क्स आए और कहा, “हां,रोटी सबसे जरुरी चीज है। राज्य ‘अमीरों’ के लिए है। इसलिए हमें रोटी के लिए संघर्ष करना होगा। उन्होंने देखा की मनुष्य मुख्य रुप से शरीर से बना है, और वह रोटी चाहता है। लेकिन जिसने कार्ल मार्क्स के रास्ते का अनुसरण किया उन्होंने महसूस किया कि वे ना तो रोटी थे ना ही वोट का अधिकार।

इसके दूसरे छोर पर अमेरिका है। वहां रोटी और वोट का अधिकार दोनों है। इसके बावजूद वहां शांति और खुशी की कमी है। अमेरिका में आत्महत्या करने वालों, मानसिक रोगियों और नींद की दवाई लेकर सोने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है। लोग इस नई स्थिति से कारण को लेकर उलझन में हैं। मनुष्य को रोटी और वोट का अधिकार मिला फिर भी वहां शांति, और खुशी नहीं है। अब वे अपनी चैनभरी नींद वापस चाहते हैं। वर्तमान अमेरिका में गहरी और बिना बाधा की नींद एक दुर्लभ वस्तु है। जो लोग सोचते हैं, वे महसूस करते हैं कि कहीं कोई बुनियादी गलती है, तभी जीवन में सभी अच्छी चीजें होने के बावजूद वे खुश नहीं हैं।

इसका कारण यह है कि उन्होंने मानव की एकीकृत स्वरुप की कल्पना नहीं की। हमारे देश में हमने इस विषय पर अच्छी तरह विचार किया है। इसलिए हमारे यहां कहा गया है कि मानव के विकास मतलब उसके शरीर, मन, बुद्धि, और आत्मा के एकीकृत विकास से है। अधिकतर इस तरह का प्रचार किया गया कि भारतीय संस्कृति सिर्फ आत्मा के मोक्ष के बारे में सोचती है। यह दूसरी चीजों के बारे में चिंता नहीं करती। यह गलत है। हम आत्मा के बारे में नहीं सोचते लेकिन यह सही नहीं है कि हम शरीर, मन और बुद्धि को महत्व नहीं देते। दूसरे केवल शरीर के महत्व देते हैं। इसलिए हमारा आत्मा पर ध्यान देना अनोखा बात है।
समय के साथ यह धारणा बनाई गई कि हम केवल आत्मा की चिंता करते हैं और मानव के दूसरे पहलुओं की नहीं। एक अविवाहित युवा लड़का अपनी मां का ध्यान रखता है, लेकिन विवाह के बाद वह अपनी मां और पत्नी दोनों का ध्यान रखता है, और दोनों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाता है। अब अगर कोई कहता है कि इस आदमी को अपनी मां से प्यार नहीं है तो यह असत्य होगा। एक पत्नी भी पहले अपने पति को ही प्यार करती है, लेकिन बच्चे के जन्म के बाद, वह अपने पति और बच्चे दोनों को प्यार करती है। कभी – कभी लापरवाह पति महसूस करता है कि बच्चे के जन्म के बाद पत्नी उसकी उपेक्षा करती है। लेकिन आमतौर पर यह सही नहीं होता। अगर यह सही है तो इसका मतलब है कि पत्नी अपना कर्तव्य निभाने में विफल हो गई।
इसी तरह, जब हम आत्मा पर ध्यान देने की जरुरत समझते हैं तो शरीर की उपेक्षा नहीं करते। उपनिषदों में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि कमज़ोर व्यक्ति स्वंय को महसूस नहीं कर सकता। शरीर सही मायने में उन जिम्मेदारियों को निभाने का प्राथमिक साधन है जिन्हें धर्म में शामिल किया गया है। हमारी स्थिति और पश्चिम में बुनियादी अतंर यह है कि जहां उन्होंने शरीर और उसकी इच्छाओं की पूर्ति को उद्देश्य माना है वहीं हम शरीर को हमारे उद्देश्य की पूर्ति का साधन मानते हैं। हमने इसी मायने में शरीर की महत्व को मान्यता दी है।

हमारी शारीरिक आवश्यकताओं की संतुष्टि आवश्यक है, लेकिन हम इसे हमारे प्रयासों का एकमात्र उद्देश्य नहीं मानते। भारत में, हमने हमारे सामने मानव के एकीकृत के लिए शरीर, मन, बद्धि और आत्मा इस चारों की आवश्यकताओं को पूरा करने का आदर्श सामने रखते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से चार काम मानव को करने होते हैं। पुरुषार्थ का मतलब है वह प्रयास जो व्यक्ति को करने चाहिए। व्यक्ति में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिए जन्मजात आकांक्षा होती है और इन चारों की संतुष्टि के लिए हमने एकीकृत तरीके से ही सोचा।

हालांकि सभी परुषार्थों में मोक्ष को सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है, लेकिन माना जाता है कि मात्र मोक्ष पाने का प्रयास करने से आत्मा को लाभ नहीं होता। दूसरी तरफ, माना जाता है कि जो व्यक्ति फल की चिंता किए बिना कर्म में लगा रहता है उसे जल्दी और निस्सन्देह मोक्ष की प्राप्ति होती है।
अर्थ में वह सब शामिल है जिसे राजनैतिक और आर्थिक नीतियां कहा जाता है। पूर्वजों के अनुसार, इसमें न्याय और सजा भी शामिल था। काम प्राकृतिक इच्छाओं की संतुष्टि से जुड़ा है। “धर्म” उन नियमों का संग्रह है जिनसे समाजिक गतिविधियां नियंत्रित होती हैं। अर्थ और काम अभिन्न और सौहार्दपूर्ण तरीके से प्रगति करते हैं, और फिर सिर्फ काम और अर्थ ही नहीं बल्कि अंतत: मोक्ष भी हासिल होता है।

इस तरह से धर्म भी अर्थ और काम को नियंत्रित करता है। ये तीनों एक दूसरे से जुड़े हैं और परस्पर पूरक हैं। धर्म अर्थ को पाने में मदद करता है। यहां तक की व्यापार में ईमानदारी, संयम और सत्यवादिता आदि की जरुरत होती है। जो की धर्म के गुण हैं। इन गुणों के बिना कोई पैसा नहीं कमा सकता। इस बात को स्वाकार किया जाना चाहिए कि अर्थ और काम की प्राप्ति के लिए धर्म बहुत महत्वपूर्ण है। अमेरिका के लोगों ने कहा, “ईमानदारी सबसे अच्छी व्यापार नीति है”। यूरोप में कहते हैं, “ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है”। हम एक कदम आगे जाकर जोर देते हैं “ईमानदारी नीति नहीं है बल्कि एक आदर्श है” अर्थात् हम धर्म पर सिर्फ लिए विश्वास नहीं करते कि वह अर्थ पाने के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि इसलिए कि यह सभ्य जीवन का मूलभूत सिद्धांत है।

काम भी सिर्फ धर्म के सहारे ही पाया जा सकता है। भौतिक चीजों जैसे अच्छे खाने का उत्पादन करने के बाद इसको कब, कहां, कैसे और कितनी मात्रा में उपयोग करना है इसका निर्धारण धर्म से ही हो सकता है। अगर एक बीमार व्यक्ति स्वस्थ लोगों का खाना खाता है या इसका उल्टा होता है, तो दोनों को ही नुकसान होगा। धर्म मनुष्य की प्राकृतिक प्रवृत्ति को रोकने में मदद करता है, जिससे वह स्वंय के लिए सुखद चीजों के अलावा फायदेमंद चीजों का भी निर्धारण कर पाता है। इसलिए धर्म को हमारी संस्कृति में सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है।

धर्म सबसे महत्वपूर्ण है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अर्थ के बिना धर्म का पालन करना संभव नहीं है। एक कहावत है, “भूख से मर रहा व्यक्ति कोई भी पाप करेगा? जिसका सब कुछ खो चुका है वह क्रूर बन जाएगा”। यहां तक की भूख से पीड़ित ऋषि विश्वामित्र एक शिकारी के घर में घुस गए और कुत्ते का मांस खा लिया। चूंकि धन भी धर्म को मजबूती देता है, इसलिए हम लगातार पर्याप्त धन का स्रजन करने पर खुश होते हैं। अराजकता के समय में, जंगल का कानून लागू होता है तो ताकतवर कमजोर का शोषण करता है इसलिए धर्म की स्थापना के लिए राज्य में स्थिरता आवश्यक है।

यह करने के लिए, शिक्षा, चरित्र निर्माण, आदर्शवाद का प्रचार, और उपयुक्त आर्थिक ढांचे का होना आवश्यक है। सरकार भी धर्म के दायरे में आती है। राज्य की जरुरत से ज्यादा ताकत धर्म के लिए हानिकारक है। यह कहा गया है कि राजा को अपने लोगों से साथ कभी भी बहुत कठोर या बहुत नरम नहीं होना चाहिए। कठोर उपायों पर बहुत ज्यादा भरोसा करने से लोगों में विद्रोह की भावना आती है। जब राज्य धर्म की वास्तविक स्थिति को हड़प लेता है तो राज्य के पास सत्ता की प्रधानता हो जाती है जो अपने आप में एक बुराई है। निर्दयी राज्यों में धर्म के पतन का यही कारण है।

जब राज्य के राजनैतिक और आर्थिक दोनों शक्तियों को अपने हाथ में ले लेता है तो धर्म का पतन होता है। इसी तरह अगर राज्य के पास असीमित शक्ति होने पर पूरा समाज हर चीज के लिए राज्य की तरफ देखता है। सरकार के अधिकारी अपना कर्तव्य उपेक्षा करते हैं और निहित स्वार्थों के लिए काम करने लगता है। ये सभी राज्य के पास असीमित शक्ति होने के चिन्ह हैं।

धर्म पीछे हट जाता है । इसलिए अर्थ को इन दोनों पर ही अधिकार नहीं जमाने देना चाहिए।
कर्म पर भी इसी तरह विचार किया गया है। अगर शारीरिक आवश्यकताओं की उपेक्षा की जाएगी, और आकांक्षाओं को पूरी तरह दबाया जाएगा तो धर्म का विकास नहीं होगा। अगर किसी के पास खाने के लिए भोजन नहीं है तो धर्म का पालन नहीं होगा। अगर दिमाग को संतुष्ट करने वाली ललित कलाओं को पूरी तरह रोक दिया जाएगा तो लोगों पर सभ्यता का असर दिखाई नहीं देगा। दिमाग विकृत होगा और धर्म की उपेक्षा होगी। दूसरी ओर रोम के भक्षकों का लालच या ययाति की इंद्रियगम्यता लागू होगी तो कर्तव्यों को भुला दिया जाएगा।

इसलिए धर्म द्वारा लगातार काम का अनुसरण किया जाना चाहिए। इस प्रकार हम एक व्यक्ति के जीवन को पूरी तरह से और एकीकृत रुप में लेते हैं। हम शरीर, दिमागी बुद्धि के साथ – साथ आत्मा के सन्तुलित विकास का लक्ष्य निर्धारित किया है। हमने इस बात का ध्यान रखते हुए व्यक्ति की बहुत सी आकांक्षाओं को पूरा करने की कोशिश की है कि दो अलग-अलग आकाक्षाओं को पूरा करने का प्रयास परस्पर विरोधी नहीं हो। यह एक व्यक्ति और चारों आकाक्षाओं की एकीकृत तस्वीर है। एक पूर्ण मनुष्य, एकीकृत व्यक्ति का विचार हमारा लक्ष्य होने के साथ हमारा मार्ग भी रहा है। इस एकीकृत व्यक्ति का समाज के साथ क्या संबंध होना चाहिए और समाज के हितों को कैसे बढ़ाया जाए इस बारे में कल विचार करेंगे।

एकात्म मानववाद – अध्याय 3

कल हमने मनुष्य को एक व्यक्ति के रुप में देखा था। एक व्यक्ति के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू होते हैं, विभिन्न तरह की आवश्यकताएं होती हैं। पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करने के लिए, सभी स्तरों पर एक साथ आवश्यकताओं की उत्तरोत्तर पूर्ति होनी चाहिए, उसके लिए कुछ खास तरह के प्रयासों की आवश्यकता होती है। इनको भी ध्यान में रखा गया था। लेकिन मानव केवल एक व्यक्ति नहीं है। शरीर, मन, बुद्धि, और आत्मा से बना व्यक्ति एकवचन “मैं” तक सीमित नहीं है बल्कि उसका बहुवचन “हम” से भी अभिन्न संबंध है।

इसलिए हमें समूह या समाज के बारे में भी सोचना चाहिए। यह एक साधारण सी सच्चाई है कि समाज मनुष्यों का समूह है। लेकिन समाज का निर्माण कैसे हुआ? दर्शनशास्त्रियों के द्वारा बहुत से विचार रखे गए हैं। पश्चिम में जो विचार सामने आया और जिस पर पश्चिमी सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था आधारित है उसके अनुसार “समाज व्यक्तियों का समूह है जिसे व्यक्तियों ने एक आपसी समझौते के बाद बनाया है।”

इस विचार को “सामाजिक समझौता सिद्धांत” के नाम से जाना जाता है। इसमें व्यक्ति को अधिक महत्व दिया गया है। अगर पश्चिम के विचारों में इसको लेकर कोई अंतर है तो वह इस प्रश्न से जुड़ा है, कि , “अगर व्यक्ति ने समाज को बनाया तो अवशेषी शक्तियां किसके पास रहेंगी, समाज के पास या व्यक्ति के पास? क्या व्यक्ति के पास समाज को बदलने का अधिकार होगा? क्या समाज व्यक्ति पर अलग-अलग तरह के प्रतिबंध लगाकर व्यक्ति को स्वंय से जोड़ सकता है? या व्यक्ति इस प्रश्नों से स्वतंत्र है? ”

व्यक्ति बनाम समाज

इस प्रश्न पर पश्चिम में विवाद रहा है। कुछ ने समाज को सर्वोच्य माना और इसी से विवाद का जन्म हुआ। सच्चाई यह है कि यह विचार कि व्यक्ति ने समाज का निर्माण किया, बुनियादी रुप से गलत है। यह सही है कि समाज बहुत व्यक्तियों से मिल कर बना है। फिर भी इसे व्यक्तियों ने नहीं बनाया, ना ही कुछ व्यक्तियों के मिलने मात्र से यह अस्तित्व में आया ।

हमारे विचार में समाज ने स्वत जन्म लिया। एक व्यक्ति की तरह समाज भी जैविक तरीके से अस्तित्व में आया। लोग समाज का निर्माण नहीं करते। यह कोई क्लब , या ज्वाइन्ट स्टॉक कम्पनी, या पंजीकृत सहकारी समिति नहीं है। सच्चाई यह है कि समाज खुद के “स्व” के साथ एक इकाई है, इसका अपना जीवन है, यह एक व्यक्ति की तरह ही संप्रभु है, यह एक जैविक इकाई। हमने इस विचार को स्वीकार नहीं करते कि समाज एक स्वेच्छाचारी संस्था है। इसका अपना जीवन है। समाज का अपना शरीर, मन, बुद्धि, और आत्मा है। कुछ पश्चिमी मनोवैज्ञानिक इस सत्य को स्वीकार करने लगे हैं।

मैक्डूगल ने मनोविज्ञान की नई शाखा की शुरुआत की जिसे ग्रुप माइंड कहा गया। उसने स्वीकार किया कि समूह का अपना मन, अपना मनोविज्ञान, सोचने और काम करने का अपना तरीका होता है।

समूह की अपनी भावनाएं भी होती हैं। ये पूरी तरह व्यक्तिगत भावनाओं के समान नहीं होती। समूह की भावनाओं को मात्र व्यक्तिगत भावनाओं को गणितीय रुप से जोड़ कर नहीं समझा जा सकता। बुद्धि, भावना और ऊर्जा, समूह की शक्तियां ये व्यक्ति से अलग होती हैं।

इसलिए, कभी—कभी इस बात का अनुभव किया गया कि कोई व्यक्ति शारीरिक रुप से कमजोर होत हुए भी समाज में एक बहादुर व्यक्ति बन कर सामने आता है। कभी-कभी व्यक्ति स्वंय का अपमान सह लेता है लेकिन समाज का अपमान सहने के लिए तैयार नहीं होता। यह संभव है कि जो व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में बहुत ऊंचे चरित्र का है वह समाज का सदस्य होने के नाते बुरा हो सकता है। इसी तरह एक व्यक्ति समाज में अच्छा हो सकता है लेकिन हो सकता है कि व्यक्तिगत जिंदगी में अच्छा नहीं हो। यह बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है।

वर्तमान में एक सामान्य भारतीय युवा छात्र कोमल और नम्र है। बीस साल पहले के सामान्य छात्र से तुलना करें तो वह हर तरह से कमजोर और कोमल हैं। लेकिन जब इस तरह के छात्रों को आपस में जोड़ा जाता है तो स्थिति जटिल हो जाती है। तब वे हर तरह के गैर-जिम्मेदार हरकत करते हैं। इसलिए अकेला छात्र अनुशासित दिखाई देता है लेकिन छात्रों का समूह अनुशासित बन जाता है। हम इस बात पर ध्यान देना होगा यह बदलाव क्यों आया। व्यक्तिगत मानसिकता से अलग इसे भीड़ की मानसिकता कहा जाता है।
भीड़-मानसिकता मन का छोटा सा पहलू है। जब एक समूह के लोग कुछ समय के लिए इकट्ठा होते हैं तो उस समूह की सामूहिक मानसिकता को भीड़ की मानसिकता कहा जाता है। लेकिन समाज औऱ सामाजिक मानसिकता को विकसित होने में लंबा समय लगता है। एक शोध पत्र है जिसके अनुसार जब किसी समूह के लोग लंबे समय तक साथ रहते हैं , भले ही ऐतिहासिक परम्परा हो या संगति, लगातार मिलने जुलने से, वे एक जैसा सोचने और एक जैसा व्यवहार करने लगते हैं। यह सत्य है कि एक साथ रहने से कुछ एकरूपता आती है। समान झुकाव के दो व्यक्तियों के बीच दोस्ती होती है। हालांकि एक राष्ट्र या एक समाज मात्र एक साथ रहने से उत्पन्न नहीं होते।

प्राचीन काल के शक्तिशाली राष्ट्र क्यों समाप्त हो गए ?

हम जानते हैं कि कुछ प्राचीन राष्ट्र समाप्त हो गए । प्राचीन ग्रीक राष्ट्र समाप्त हो गया। इसी तरह मिश्र की सभ्यता समाप्त हो गई। बेबिलोन और सीरिया की सभ्यता भी इतिहास का हिस्सा बन गई। क्या कोई ऐसा समय भी था जब इन राष्ट्रों के नागरिकों ने साथ रहना छोड़ दिया हो ? यह मात्र एक तथ्य है कि वहां लोगों के बीच बहुत व्यापक मतभेद हो गए थे जिसके कारण ये राष्ट्र समाप्त हो गए।

ग्रीस ने पूर्वकाल में अलेक्जेंडर और हिरोटोडस, यूलिसिस और अरस्तू, सुकरात और प्लेटो को पैदा किया था और आज भी ग्रीस में उसी आनुवांशिकी से आए लोगों का निवास है। उनकी वंश-परम्परा में कोई रुकावट नहीं आई, क्योंकि ऐसा कोई समय नहीं आया जब ग्रीस पूरी तरह लोगों से खाली हो गया हो और उसके बाद किसी नई जाति ने देश में बसी हो। इस तरह की घटना कभी नहीं हुई। प्राचीन ग्रीस की पिता-पुत्र की परम्परा में कभी बाधा नहीं आई।

250 से 500 पीढियों पहले देखें तो आज के वर्तमान ग्रीक लोगों को प्राचीन ग्रीक लोगों से जोड़ा जा सकता है। इसके बावजूद कि प्राचीन ग्रीक राष्ट्र अब अस्तित्व नहीं है। इसी तरह प्राचीन मिश्र राष्ट्र भी मौजूद नहीं है। उन जगहों पर नये राष्ट्र बन गए। यह कैसे हुआ ? यह साधारण से तथ्य पर कोई विवाद नहीं है कि मात्र एक साथ रहने से राष्ट्रों का निर्माण नहीं होता। इन समाप्त हो चुके राष्ट्रों के नागरिकों ने भी कभी समूह में रहना नहीं छोड़ा था।

दूसरी तरफ इजराइल के यहूदी सदियों तक दूर-दूर बिखरे हुए और दूसरे लोगों के साथ रहे, फिर भी मात्र साथ रहने से वे उन समाजों में विलुप्त नहीं हो गए। इसलिए यह स्पष्ट है कि राष्ट्रवाद की भावना का जमीन के किसी खास टुकड़े पर रहने से नहीं आती बल्कि यह किसी दूसरी चीज से आती है।

राष्ट्र क्या है ?

इसका स्रोत उस लक्ष्य में है जो लोगों के सामने रखा गया है। जब लोगों का समूह एक लक्ष्य एक मिशन और एक आदर्श के साथ रहता है और किसी खास भूमि को अपनी मातृभूमि मानता है तो यह समूह राष्ट्र का निर्माण करता है। अगर आदर्श और मातृभूमि, दोनों में से एक भी अगर नहीं होगा तो कोई राष्ट्र भी नहीं होगा। शरीर में एक “स्व” होता है जो व्यक्ति का सार होता है; शरीर के साथ रिश्ते के विच्छेद होने के कारण व्यक्ति को मृत माना जाता है।

इसीतरह एक राष्ट्र का विचार, आदर्श , या मूलभूत सिद्धांत, और आत्मा होती है। हालांकि यह माना जाता है कि मनुष्य बार-बार जन्म लेता है, फिर भी पुनर्जन्म लेने वाला व्यक्ति अलग व्यक्ति होता है। उन्हें दो अलग-अलग प्राणी माना जाता है। वही आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे में प्रवेश करती है, लेकिन पहला और बाद वाला व्यक्ति दो अलग मनुष्य हैं। व्यक्ति के मरने का मतलब बस इतना है कि उसकी आत्मा ने यह शरीर छोड़ दिया है। शरीर के दूसरे हिस्सों में भी बदलाव होता है।
बचपन से लेकर बुढापे तक, बहुत जबरदस्त बदलाव होता है ! जीवविज्ञानी हमें बताते हैं कि हर कुछ वर्षों में शरीर की हर कोशिका नई कोशिका से बदल जाती है। कई तरह के परिवर्तन होते हैं। क्योंकि आत्मा बिना किसी बाधा के शरीर में रहती है, शरीर का अस्तित्व बना रहता है, इस संबंध को तर्क में “मान्यता का सिद्धांत” कहते हैं। इस पहचान के कारण हम किसी तत्व के लगातार अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। इस संबंध में नाई के उस्तरे का बढिया उदाहरण दिया जाता है।

एक बार ग्राहक की दाढ़ी बनाते समय, नाई ने अपने उस्तरे की तारीफ करते हुए कहा कि यह 60 साल पुराना है। उसके पिता भी उसी उस्तरे से काम किया करते थे। ग्राहक आश्चर्यचकित हुआ खासकर यह देखकर कि उस्तरे का हत्था काफी चमकदार और नए जैसा लग रहा था। “इसका हत्था इतना चमकदार कैसे है? तुमने साठ वर्षों तक इसकी चमक को कैसे बनाए रखा ”? उसने पूछा। नाई भी इससे चकित हुआ। क्या हत्थे को साठ वर्षों तक नए जैसा बनाए रखना संभव है ? इसे छ महीने पहले ही बदला है”।

उसने आराम से उत्तर दिया। ग्राहक ने कौतूहल से पूछा इसका छुरा कितना पुराना है? तीन साल नाई ने उत्तर दिया। संक्षेप में कहें तो, उस्तरे का हत्था और छुरा दोनों ही बदले गए थे, लेकिन उस्तरा फिर भी पुराना था! इसकी पहचान वही थी। इसी तरह एक राष्ट्र की भी आत्मा होती है। इसका एक तकनीकी नाम भी है। जनसंघ द्वारा स्वीकार किए “सिद्धांत और नीतियों” में इस नाम का उल्लेख किया गया है। नाम है चित्त। मैग्डूगल के अनुसार यह समूह का आंतरिक स्वभाव है। व्यक्तियों के हर समूह का आंतरिक स्वभाव होता है। इसी तरह हर समाज का अपना आंतरिक स्वभाव होता है, यह स्वभाव जन्मजात होता है और जिसके पीछे कोई एतिहासिक कारण नहीं होता।

एक मनुष्य का जन्म आत्मा के साथ होता है। मनुष्य का व्यक्तित्व, आत्मा और चरित्र सभी एक दूसरे से अलग होते हैं। व्यक्तित्व किसी व्यक्ति के सभी कार्यों, विचारों और प्रभाव के मिले जुला असर से बनता है। लेकिन आत्मा इस इतिहास से प्रभावित नहीं होती, इसी तरह राष्ट्रीय संस्कृति ऐतिहासिक कारणों और परिस्थितियों के कारण लगातार संशोधित और विकसित होती रहती है। संस्कृति में वे सभी चीजें शामिल हैं जिन्हें संपर्क, कोशिश और समाज के इतिहास के कारण अच्छा और प्रशंसनीय माना जाता है। लेकिन ये सब चिति में शामिल नहीं है। चिति मूलभूत होती है और यह शुरु से ही राष्ट्र के केन्द्र में रही है। चिति उस दिशा का निर्धारण करती है जिस तरफ राष्ट्र को सांस्कृतिक रुप से आगे बढना होता है। जो चीज चिति के अनुकूल होती है उसे संस्कृति में शामिल कर लिया जाता है।
चिति, संस्कृति, धर्म

उदाहरण के तौर पर महाभारत की कहानी को देखते हैं। कौरवों की हार हुई और पांडव विजयी हुए। हम पांडवों के कार्य को धर्म क्यों समझते हैं ? या इस लड़ाई को मात्र राज्य को पाने की लडाई क्यों नहीं समझा जाता? युधिष्ठर के लिए सम्मान और दुर्योधन के लिए घृणा राजनैतिक कारणों से नहीं है। कृष्ण ने अपने मामा कंस के मारा जो अपने समय के स्थापित राजा थे। इसको एक विद्रोह कहने की बजाए , हम कृष्ण को भगवान का अवतार मानते हैं, और कंस को असुर मानते हैं।

लंका पर चढ़ाई में रावण के भाई विभिषण ने राम का साथ दिया। विभिषण ने जो कुछ किया उसे देशद्रोह कहने की बजाए हम उसे अच्छा और अनुकरणीय मानते हैं। उसने अपने भाई और राजा को धोखा दिया जैसा कि बाद में जयचंद ने किया। उसे को “देशद्रोही” कहा जाना चाहिए। लेकिन विभिषण को “देशद्रोही” नहीं माना जाता। इसके उलट उसके काम की प्रशंसा की जाती है, और रावण के काम को स्वीकृती नहीं दी जाती। ऐसा क्यों ? इसके पीछे राजनैतिक कारण नहीं है।

अगर काम की अच्छाई या बुराई तय करने का कोई मानक है तो वह चिति है; प्रकृति में जो कुछ भी चिति के अनुकूल है उसे सही मानकर हम संस्कृति में जोड़ते चले गए। इन चीजों को हमें बढ़ाना होगा। जो कुछ भी चिति के विरुद्ध है उसे विकृति और अनुचित मानकर छोड़ दिया। चिति वह मापदंड है जिस पर हर काम, हर मनोभाव का जांच की जाती है, और उस पर खरा उतरना जरुरी है। “चिति” राष्ट्र की आत्मा है। इस चिति की शक्ति से ही राष्ट्र उठता है। अगर चिति का मतलब मजबूती और साहस ही है तो यह राष्ट्र के हर महान व्यक्ति में दिखाई देती है।

व्यक्ति भी राष्ट्र की आत्मा यानि “चिति” को प्रकट करने का एक साधन है। इसलिए स्वंय के अलावा एक व्यक्ति राष्ट्र का भी प्रतिनिधित्व करता है। सिर्फ यही नहीं, बल्कि वह उन संस्थाओं को भी मजबूत करता है जिन्हें राष्ट्र के लक्ष्यों की पूर्ति के लिए बनाया गया है। संक्षेप में कहें तो एक व्यक्ति के बहुमुखी पहलू होते हैं, लेकिन वे परस्पर विरोधी नहीं हैं; वहां एक सहयोग है। उनमें एकता और समन्वय होता है। मानव जाति के विभिन्न आदर्शों की पारस्परिक पूरक प्रकृति की मान्यता पर आधारित एक व्यवस्था, एक व्यवस्था जो कानून बनाए, जो विसंगति को दूर करके आपसी उपयोगिता और सहयोग को बढ़ाए, ऐसी व्यवस्था अकेले ही मानव जाति के लिए शांति और खुशियां लाकर विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

संस्था – राष्ट्र की आवश्यकता पूर्ति का साधन

डार्विन के सिद्धान्त अनुसार , जीवत प्राणी अपनी परिस्थितियों के कारण पैदा हुई जरुरतों के अनुसार अंगो का विकास होता है। हमारे शास्त्रों में इसे कुछ अलग तरीके से कहा गया है। शास्त्रों में कहा है कि जीवन को चलाए रखने के लिए, प्राण की शक्ति का प्रयोग करके, आत्मा जरुरत के अनुसार अंगो का निर्माण करती है। जिस तरह से आत्मा शरीर में विभिन्न अंगों का निर्माण करती है उसी तरह राष्ट्र में राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के साधन के तौर पर बहुत से अंगों का निर्माण किया जाता है। जैसे एक कारखाने में विभिन्न विभाग होते हैं, इमारत, मशीनें, बिक्री, उत्पादन, रखरखाव आदि की तरह राष्ट्र में भी बहुत से विभाग होते हैं जिन्हें संस्थाएं कहा जाता है।

राष्ट्र की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इन संस्थाओं का निर्माण किया जाता है। परिवार, जाति, संघ ( जिसे मजदूर संघ कहा जाता है) आदि, इस तरह की संस्थाएं हैं। संपत्ति, विवाह भी संस्थाएं हैं। पहले शादी नहीं होती थी। बाद में किसी ऋषि ने शादी की प्रथा को शुरु किया। उन्होने शादी नाम की संस्था की नींव रखी। इसी तरह गुरुकुल और ऋषिकुल भी संस्थाएं थी। इसी क्रम में , राज्य भी एक संस्था है। राष्ट्र इसको बनाता है। पश्चिम में बहुत सारी समस्याएं इस कारण है क्योंकि वे राज्य को राष्ट्र समझने की भूल करते हैं। वे राज्य को राष्ट्र का प्रयाय समझते हैं। सच्चाई यह है कि राज्य और राष्ट्र एक नहीं हैं। हमारे देश में मान्यता है कि सामाजिक समझौते के सिद्धांत से राज्य का निर्माण हुआ। पहले कोई राजा नहीं होता था। महाभारत में इसको कृतयुग कहा गया है, उस समय कोई राजा या राज्य नहीं था। धर्म का पालन करते हुए पारस्परिक रुप से समाज की रक्षा करने के साथ उसकी निरंतरता को बनाए रखा जाता था।

बाद में रुकावट और गड़बड़ी सामने आने लगीं। लालच और क्रोध का बोलबाला हो गया। धर्म का पतन होने लगा और “जिसकी लाठी उसकी भैंस” के नियम का राज हो गया। ऋषि यह देख कर परेशान होने लगे। वे सलाह के लिए ब्रह्मा के पास गए, ब्रह्मा ने उनको “कानून और राज्य के कार्य” विषय पर स्वंय की लिखी पुस्तक दी। इसी समय , उन्होंने मनु से पहला राजा बनने को कहा। मनु ने राजा बनने से मना कर दिया। मनु ने कहा कि राजा को दूसरे लोगों को दंड देने और जेल में डालने जैसे बहुत से काम करने होंगे और वह ये सब पाप करने के लिए तैयार नहीं हैं।

इस पर ब्रह्मा ने कहा कि राजा के तौर पर किए गए कार्यों के लिए तुम पाप के भागी नहीं बनोगे। लेकिन उन कार्यों का उद्देश्य ऐसी परिस्थितियों का निर्माण होना चाहिए जिससे समाज शांतिपूर्ण तरीके से धर्म के आधार पर अपना जीवन जी सके। यह तुम्हारा कर्तव्य होगा, तुम्हारा धर्म होगा। इतना ही नहीं तुम्हें तुम्हारी प्रजा के कर्मों का भी फल मिलेगा। अगर तुम्हारी प्रजा धर्म के अनुसार आचरण करेगी तो तुमको भी उस धर्म का फल मिलेगा। हालांकि इसे साफ तौर पर यहां नहीं कहा गया है,लेकिन मेरा मानना है कि अगर किसी राजा की प्रजा पाप करती है तो उस पाप का कुछ हिस्सा राजा को भी मिलता है। राजा सिर्फ अच्छी चीजों में भागादारी करे यह तो सही नहीं होगा, उसे बुरे में भी उसी अनुपात में हिस्सा मिलना चाहिए।

इस प्रकार राज्य एक अनुबंध के रुप में अस्तित्व में आया। अनुबंध का यह सिद्धांत राज्य पर तो लागू किया जा सकता है लेकिन राष्ट्र पर नहीं। पश्चिम में यह बिल्कुल उलट था। उनके अनुसार राष्ट्र के तौर पर समाज एक अनुबंध था, लेकिन राजा के पास दैवीय अधिकार थे और वह स्वयं को भगवान का एकमात्र प्रतिनिधि मानता था। यह गलत है। हमारे देश में, भले ही प्राचीन काल में राजा को सबसे पहले मान्यता दी गई हो लेकिन माना जाता है कि समाज का राष्ट्र के तौर जन्म अपनेआप हुआ । राज्य मात्र एक संस्था है।
इसी प्रकार राज्य की तरह दूसरी सस्थाओं को भी आवश्यकता होने पर बनाया गया। प्रत्येक व्यक्ति किसी एक संस्था या बहुत सी संस्थाओं के अंग की तरह है। एक व्यक्ति अपने परिवार का सदस्य होने के साथ ही अपने समुदाय का भी सदस्य होता है; अगर वह किसी तरह के व्यवसाय से जुड़ा है तो उस व्यवसाय की संस्था का सदस्य भी हो सकता है। इस सबसे बढकर वह राष्ट्र और समाज का सदस्य होता है।

अगर हम बड़े क्षेत्र की बात करें तो वह पूरी मानवजाति का सदस्य है, और फिर पूरे ब्रह्मांड का। सही मायने में कहें तो एक व्यक्ति मात्र एक इकाई नहीं है बल्कि अनेक इकाईयों से मिल कर बना है। वह सिर्फ एक नहीं बल्कि बहुत सी संस्थाओं का हिस्सा है। वह बहुत तरह का जीवन जीता है। सबसे जरुरी पहलू यह है कि विविध व्यक्तित्व होते हुए भी, उसे इस तरह से व्यवहार करना चाहिए कि उसके विविध पहलूओं में आपसी संघर्ष होने की जगह परस्पर सहयोग , समन्वय , पूरकता और एकात्मकता हो। व्यक्ति में जन्मजात यह गुण होता हैं।

जो व्यक्ति इस गुणों का सही तरह से उपयोग करता है वह खुश रहता है और दूसरी तरफ जो ऐसा नहीं करता वह दुखी रहता है। इस तरह के व्यक्ति के जीवन में संतुलित विकास नहीं होगा। उदहारण के तौर पर, एक व्यक्ति अपने पिता का बेटा है, अपनी पत्नी का पति है, अपनी बहन का भाई है और अपने पुत्र का पिता है। एक व्यक्ति पिता होने के साथ बेटा भी है, भाई होने के साथ पति भी है। उसे अपनी बुद्धि, समझ और कुशलता से इस सभी रिश्तों को बनाए रखना है।

जहां व्यक्ति यह करने में असफल होता है वहीं संघर्ष होता है। अगर वह एक का पक्ष लेता है को दूसरे को गलत महसूस होता है। उसके सही तरह से व्यवहार नहीं करने के कारण उसकी पत्नी और बहनों के बीच या उसकी पत्नी और मां के बीच संघर्ष होता है। वहां उसके कुछ रिश्तों में तनाव आ जाता है। उसे दुख होता है क्योंकि मां और पत्नी के प्रति उसके कर्तव्यों के बीच संघर्ष होता है। जब वह इस संघर्ष को हल करके अपने सभी दायित्वों को पूरा करता है जो कहा जा सकता है कि उसका समन्वित विकास होगा।
समाज और व्यक्ति में संघर्ष नहीं

हम व्यक्ति के विविध व्यक्तित्व और विभिन्न संस्थाओं के बीच स्थाई संघर्ष के विचार को नहीं मानते। अगर संघर्ष होता है तो यह पतन और विकृति का चिन्ह है प्रकृति या संस्कृति का नहीं। पश्चिमी संस्कृति में गड़बड़ी यह है कि वहां कुछ लोग मानते हैं कि मानव का विकास इस मूलभूत संघर्ष का ही परिणाम है। इसलिए वे व्यक्ति और राज्य के बीच संघर्ष स्वाभाविक मानते हैं, और इसी आधार पर वे वर्ग संघर्ष की भी कल्पना करते हैं।

समाज में वर्ग होते हैं। यहां भी, जातियां रही हैं, लेकिन हमने एक जाति से दूसरी जाति के बीच संघर्ष को कभी इसके पीछे का मूलभूत विचाक नहीं माना। चार जातियों के हमारे विचार में, उन्हें विराट पुरुष के चार अंगो के रुप में माना गया है। माना जाता है कि विराट पुरुष के सिर से ब्राह्मण, हाथों से क्षत्रिय, उदर से वैश्य और पैरों से शुद्रों का उत्पत्ति हुई।

जब हम इस विचार का विश्लेषण करते हैं तो हमारे सामने यह प्रश्न खड़ा होता है कि क्या विराट पुरुष के सिर, हाथ, पेट, और पैरों के बीच के कोई संघर्ष खड़ा हो सकता है। अगर संघर्ष मूलभूत है तो शरीर काम ही नहीं कर पाएगा। एक ही शरीर के विभिन्न हिस्सों के बीच कोई संघर्ष हो ही नहीं सकता। इसके विपरीत “एक व्यक्ति” प्रबल होता है। ये अंग एक दूसरे के पूरक ही नहीं हैं बल्कि इससे भी ज्यादा ये स्वतंत्र इकाई हैं। वहां पूरी तरह से अनुराग और आत्मीयता का भाव है।

जाति व्यवस्था की उत्पत्ति ऊपर बताए आधार पर ही हुई। अगर इस विचार को नहीं समझा गया तो जातियां में एक दूसरे का पूरक बनने की बजाए संघर्ष पैदा होगा। लेकिन तब यह विकृति है। यह व्यवस्थित व्यवस्था नहीं है, बल्कि इसमें कोई योजना या व्यवस्था नहीं है। सचमुच हमारे समाज की आज यही दशा है।
विभिन्न कारणों से गिरावट की यह प्रक्रिया समाज के विभिन्न संस्थाओं में पैठ कर जाएगी। अगर समाज की आत्मा कमजोर होती है तो समाज के अलग-अलग अंग भी कमजोर और अप्रभावी हो जाएंगें। कोई खास संस्था कभी अनुपयोगी या हानिकारक हो सकती है। किसी संस्था की आवश्यकता और उपयोगिता समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है। किसी संस्था की वर्तमान स्थिति की जांच करते समय हमें उसी समय इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि इसे कैसा होना चाहिए। परस्पर पूरकता और एकता की भावना ये दोनों उचित व्यवहार के अकेले मानक हो सकते हैं।

परिवार, समुदाय, मजदूर संघ, ग्राम पंचायत, जनपद, राज्य और इस तरह के दूसरे संस्थान राष्ट्र और मानवजाति के अलग-अलग अंग हैं। वे एक दूसरे पर निर्भर और शुरु में पूरक होते हैं। इन सभी में एकता की भावना होनी चाहिए। इसी कारण से, इनमें संघर्ष या विरोध की जगह पारस्परिक अनुकूलता होनी चाहिए।
राज्य बहुत सी संस्थाओं में एक है, महत्वपूर्ण होते हुए भी यह किसी दूसरे से बढ़कर नहीं है। वर्तमान समय में समस्याओं का सबसे बड़ा कारण यह है कि हर कोई राज्य को समाज का पर्याय मानता है। कम से कम व्यवहार में वे राज्य को समाज का एकमात्र प्रतिनिधि मानते हैं। दूसरी संस्थाओं का प्रभाव कम हुआ है जबकि राज्य इतना प्रभावी हो गया है कि सभी शक्तियां धीरे-धीरे राज्य में केन्द्रित हो रही हैं।

हमने राज्य को राष्ट्र का एकमात्र प्रतिनिधि कभी नहीं माना। राज्य के विदेशियों के हाथों में जाने के बाद भी हमारा राष्ट्रीय जीवन बिना बाधा से चलता रहा। फारस राष्ट्र स्वतंत्रता खोने के बाद समाप्त हो गया। हमारे देश के कई हिस्सों में विदेशी शासन रहा। उसी समय पठानों ने दिल्ली के तख्त पर कब्जा किया, उसके बाद तुर्क, मुगल और अंग्रेजों में भी शासन किया।

इसके बावजूद, हमारा राष्ट्रीय जीवन चलता रहा क्योंकि राज्य इसका केन्द्र नहीं था। अगर हमने राज्य को केन्द्र माना होता तो राष्ट्र के तौर पर बहुत पहले हमारा अस्तित्व समाप्त हो गया होता। बच्चों की एक कहानी है जिसमें कहा जाता है कि किसी राक्षस की बुरी आत्मा एक तोते में रहती है और उस राक्षस को मारने के लिए तोते को मारना होगा। जिन राष्ट्रों का जीवन राज्य में केन्द्रित था वे राज्य के समाप्त होने के साथ ही खत्म हो गए। दूसरी तरफ, जहां राज्य जीवन का केन्द्र नहीं था वहां राष्ट्र राजनैतिक हस्तांतरण के बाद भी बचा रहा।

इसका धारणा का भी अपना प्रभाव पड़ा। स्वर्गीय डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने कहा था कि हमारी ग्राम पंचायत इतनी मजबूत थी कि हमने दिल्ली की गद्दी की उपेक्षा की। यह सोचकर कि राष्ट्र का जीवन राज्य पर निर्भर नहीं है ,हम राज्य को लेकर उतना चौकन्ने नहीं रहे जितना कि रहना चाहिए था । हम भूल गए कि, भले ही वह केन्द्र नहीं है लेकिन राज्य निश्चित रुप से एक महत्वपूर्ण संस्था है जो राष्ट्र की कुछ जरुरतों को पूरा करती है, जैसे किसी शरीर में अंग पूरा करता है। बिना किसी नुकसान के एक बाल तोड़ा जा सकता है लेकिन अगर बाल के साथ थोडी त्वचा भी हट जाए और अगर त्वचा के साथ सिर भी कट जाए तो शरीर का बड़ा नुकसान हो जाएगा।

इसलिए शरीर की रक्षा करनी चाहिए। हालांकि शरीर के विभिन्न अंग पूरी तरह से अनिवार्य नहीं है फिर भी ये किसी महत्वपूर्ण काम को पूरा करते हैं। इसी के आधार पर, एक राष्ट्र के जीवन में राज्य महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने इस पहलू को समझा। इसी कारण से शिवाजी के महान् गुरु समर्थ रामदास ने उनको राज्य स्थापित करने की प्रेरणा दी। धर्म की अपनी ताकत होती है। धर्म जीवन में महत्वपूर्ण है। श्री रामदास शिवाजी को सन्यासी बनकर धर्म का प्रचार करने के लिए कह सकते थे। लेकिन इसके विपरीत, उन्होंने शिवाजी को राज स्थापित करने की प्रेरणा दी क्योंकि राज्य भी समाज का महत्वपूर्ण अंग है।

हालांकि, किसी को महत्वपूर्ण मानना उसको सर्वोच्य मानने से अलग है। राज्य सर्वोच्य नहीं । तो प्रश्न उठता है कि अगर राज्य अत्यन्त महत्वपूर्ण नहीं है तो फिर अत्यन्त महत्वपूर्ण कौन है? इस प्रश्न पर विचार करते हैं।

धर्म समाज को संभालता है

हमें उन कारणों की जांच करनी होगी कि राज्य को क्यों बनाया गया। इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि राज्य के कुछ विशिष्ट उद्देश्य, कुछ आदर्श होने चाहिए। तब राज्य को महत्व देने के बजाए उस उद्देश्य या आदर्श को महत्व देना होगा क्योंकि उस आदर्श की पूर्ति के लिए ही राज्य को बनाया गया है। चौकीदार उस खजाने की से बड़ा नहीं माना जाता जिसकी वह रक्षा करता है। राज्य का निर्माण राष्ट्र की रक्षा और राष्ट्र के आदर्श को यथार्थ में बदलने वाली परिस्थितियों के निर्माण और उन्हें बनाए रखने के लिए किया गया। राष्ट्र का आदर्श “चिति” से बना है। जो किसी व्यक्ति की आत्मा के समान है। चिति को समझने के लिए प्रयास करना होगा।

राष्ट्र की चिति को बनाए रखने और प्रकट करने में मदद करने वाले नियमों को ही राष्ट्र का धर्म कहा जाता है। इसलिए “धर्म” सर्वोच्य है। धर्म राष्ट्र की आत्मा का भंडारगृह है। अगर धर्म नष्ट हुआ। तो राष्ट्र नष्ट हो जाएगा। जो धर्म को छोड़ता है वह राष्ट्र से धोखा करता है।

धर्म मंदिरों और मस्जिदों तक सीमित नहीं है। भगवान की पूजा धर्म का बस एक हिस्सा है। धर्म कहीं व्यापक है। पूर्व में मंदिर लोगों को धर्म के बारे में शिक्षा देने का प्रभावी माध्यम होते थे। हालांकि जिस तरह विद्यालय स्वंय ज्ञान को नहीं बनाते उसी तरह मंदिर धर्म का नहीं बनाते। एक बच्चा प्रतिदिन विद्यालय जाकर भी अशिक्षित रह सकता है।

इसी तरह, हो सकता है कि एक व्यक्ति प्रतिदिन मंदिर या मस्जिद जाकर भी धर्म के बारे में कुछ नहीं जान पाए। मंदिर या मस्जिद पंथ, मत, संप्रदाय का निर्माण तो करते हैं लेकिन जरुरी नहीं कि धर्म निर्माण भी करते हों। अंग्रेजी भाषा के गलत अनुवाद से जो भ्रांतियां पैदा हुई हैं उनमें धर्म को पंथ मानना सबसे हानिकारक है।
धर्म और पंथ ( रिलिजन ) अलग-अलग हैं

एक तरफ हमने पंथ शब्द को धर्म के पर्याय के रूप में प्रयोग किया और दूसरी तरफ समाज और धर्म को लेकर बढ़ती अज्ञानता और तिरस्कार, और यूरोपीय जीवन की स्वीकृति, हमारी शिक्षा की प्रमुख विशेषता बन गई। इसका नतीजा यह हुआ कि संकीर्ण पंथ के सभी लक्षण, विशेषकर जिनका पालन पश्चिम में किया जाता है उनको हमारे धर्म के विचार से भी जोड़ दिया गया। चूंकि पश्चिम में पंथ के नाम पर , अन्याय,अत्याचार किए गए, पंथ के नाम पर लड़ाईयां और संघर्ष हुए, और फिर इन सभी को धर्म के साथ भी जोड़ दिया गया।

हमें पता है कि धर्म के नाम पर भी लड़ाईयां लड़ी गई। फिर भी पंथ के नाम पर हुई लडाई और धर्म के नाम पर हुई लड़ाई दोनों अलग चीजें हैं। पंथ का मतलब है एक संप्रदाय या मत; इसका मतलब धर्म नहीं है। धर्म बहुत व्यापत विचार है। यह जीवन के सभी पहलुओं से जुड़ा है। यह समाज को संभालता है। इससे भी बढ़कर, यह पूरे विश्व को संभालता है। इसका मतलब जो संभाले वह “धर्म” है।
धर्म का मूलभूत सिद्धांत अनंत और सार्वभौमिक है। फिर भी समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुसार उनका कार्यान्वयन अलग हो सकता है। यह एक तथ्य है कि मानव को शरीर को बनाए रखने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। हालांकि, एक व्यक्ति को क्या खाना चाहिए, कितनी मात्रा में खाना चाहिए, कितने अंतराल से खाना चाहिए यह सब परिस्थितियों पर निर्भर करता है। कभी –कभी उपवास करने की सलाह भी दी जाती है। अगर टाइफाइड के मरीज़ को सामान्य भोजन दिया जाए तो उसके नतीजे विनाशकारी हो सकते हैं। इस तरह के व्यक्ति के लिए, भोजन के दूर रहना आवश्यक है, इसी प्रकार धर्म के सिद्धांतों को भी बदलते समय और गति के साथ बदलते रहना चाहिए ।

कुछ नियम अस्थाई है और कुछ लंबे समय के लिए मान्य होते हैं। कुछ नियम हैं जिनसे हमारी यह बैठक संचालित हो रही है। एक नियम यह है कि मैं बोलूंगा और आप ध्यान से सुनेंगे। अगर इस नियम का उल्लंघन होता है तो आप मेरे बोलते समय ही एक दूसरे से बातचीत या सभा को संबोधित करना शुरु कर देंगे, तो इससे अव्यवस्था फैल जाएगी; हमारा काम आगे नहीं बढ़ेगा और बैठक नहीं चल पाएगी। यह कहा जा सकता है कि आपने अपने धर्म का पालन नहीं किया।

इस प्रकार यह हमारा धर्म है कि हम आपके धर्म को समझा। इस प्रकार यह हमारा धर्म है कि हम उन नियमों का पालने करें जिनसे यह बैठक सुचारू रूप से चल पाए। लेकिन यह नियम बैठक के चलने तक ही लागू है। अगर बैठक समाप्त होने के बाद भी आप अगर घर पहुंच कर भी इस नियम का पालन करते हुए चुप रहते हैं तो दूसरी तरह की समस्या खड़ी हो जाएगी। शायद आपका परिवार डॉक्टर को बुला ले। घर पर उन्हीं नियमों का पालन किया जाएगा जो वहां के लिए उपयुक्त हैं। सामान्य शब्दों में कहे तो नियमों की पूरी पुस्तक, और उसका दार्शनिक आधार ही धर्म का अर्थ है। ये नियम मनमाने नहीं हो सकते।

वे नियम इस तरह से होने चाहिए कि बने रहे और आगे भी टिके रहे और उस इकाई के विकास में सहभागी हों जिसके लिए वे बने हैं। इसी के साथ उन्हें धर्म के व्यापक स्वरूप के साथ सहमति दिखाते हुए उसका पूरक भी होना चाहिए। ये नियम धर्म के व्यापक स्वरूप का ही हिस्सा हैं। उदाहरण के लिए, जब हम एक पंजीकृत संस्था बनाते हैं, तो हमें इसके नियम और कायदों को बनाने का अधिकार होता है लेकिन वे संस्था को बनाने के नियमों के विपरीत नहीं हो सकते। संस्था को बनाने से जुडे नियम सासाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट का उल्लंघन नहीं कर सकते। इस एक्ट को भारत के संविधान के दायरे में ही रहना होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो देश का संविधान एक मौलिक दस्तावेज है जो देश में बने सभी कानूनों पर लागू होता है। जर्मनी में संविधान को “बेसिक लॉ या कहें कि मूलभूत कानून ” कहते हैं।

क्या संविधान भी, कहीं अधिक मूलभूत प्रकृति के सिद्धांतों के अधीन नहीं है? या क्या यह संविधान सभा के किसी मनमाने फैसलों से बना है? गंभीरता से विचार करें तो यह साफ हो जाएगा कि संविधान भी प्रकृति के कुछ मूलभूत सिद्धांतों का अनुसरण करता है। संविधान राष्ट्र को बनाए रखने के लिए है। इसके बजाए अगर यह राष्ट्र के पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, तब इसको अनुपयुक्त कहा जाना चाहिए।

इसमें संशोधन किए जाने चाहिए। संशोधन भी पूरी तरह से बहुमत के निर्णय पर आधारित नहीं है। आज कल बहुमत की काफी चर्चा की जाती है। क्या बहुमत सब कुछ करने में सक्षम है? क्या बहुमत का निर्णय हमेशा उचित होता है? नहीं। पश्चिम में राजा संप्रभु होता था। उसके बाद जब राज सत्ता को उसके तथाकथित दैवीय अधिकारों से वंचित कर दिया गया, तो कहा गया कि जनता ही संप्रभु है। यहां हमारे देश में राजा, जनता और या संसद कोई भी पूर्ण रुप से संप्रभु नहीं है। संसद मनमाने कानून नहीं बना सकती।

ब्रिटिश संसद के लिए कहा गया कि यह संप्रभु है और कुछ भी कर सकती है। वे कहते हैं कि “एक महिला को पुरूष और परूष को महिला बनाने के अलावा ब्रिटिश संसद कुछ भी कर सकती है।” लेकिन क्या संसद के लिए ऐसा कानून बनाना संभव है जिसमें वह प्रत्येक अंग्रेज नागरिक को सिर के बल चलना अनिवार्य कर दे ? यह संभव नहीं है। क्या वे यह कानून लागू कर सकते हैं कि प्रत्येक अंग्रेज नागरिक को प्रतिदिन स्थानीय अधिकारियों के सामने पेश होना होगा? वे नहीं कर सकते। इंग्लैंड का कोई लिखित संविधान नहीं है। वे परम्पराओं को बहुत आदर करते हैं। लेकिन उनकी परम्पराओं में भी बदलाव हुआ है। उनकी परम्पराओं में बदलाव का क्या आधार है? इंग्लैंड़ की प्रगति में बाधा साबित हुई परम्पराओं को उन्होंने छोड़ दिया। प्रगति में सहायक परम्पराओं को संगठित किया गया ।

इंग्लैंड की तरह हर जगह परम्पराओं का आदर किया जाता है। हमारे पास लिखित संविधान है, लेकिन यह लिखित संविधान भी देश की परम्पराओं के विपरीत नहीं जा सकता। अगर यह परम्पराओं के विपरीत चलता है तो इसका मतलब है कि यह धर्म का पालन नहीं कर रहा। राष्ट्र को बनाए रखने वाला संविधान ही धर्म के अनुसार होता है। धर्म राष्ट्र को बनाए रखता है। इसलिए हमारे यहां हमेशा धर्म को सबसे महत्वपूर्ण और संप्रभु माना गया है। सभी दूसरी इकाईयां, संस्थाएं या सत्ता धर्म से ही शक्ति ग्रहण करते हैं और उसके अधीन हैं।

अगर राष्ट्र की प्रगति के हिसाब से हम अपने संविधान को परखें तो हमें पता चलेगा कि हमारे संविधान में संशोधन की जरुरत है। हम एक राष्ट्र, एक समाज हैं। इसलिए हमने भाषा, प्रांत, जाति, पंथ, आदि के आधार पर किसी को विशेष अधिकार नहीं दिए। सभी को समान नागरिकता दी। हमारे यहां अलग- अलग राज्य हैं। लेकिन राज्य और केन्द्र की अलग-अलग नागरिकता नहीं है। हम सभी भारत के नागरिक हैं।

इसी तरह हमने राज्यों को स्वतंत्र होने का अधिकार नहीं दिया है। सिर्फ यही नहीं राज्य की सीमाओं के निर्धारण और राज्यों के नाम तय करने का अधिकार भी संसद को है, विधानसभा को नहीं। यह राष्ट्रीयता और भारत की परम्परा के अनुकूल है।

हालांकि, इन सबके बावजूद, हमने हमारे संविधान को संघात्मक बनाया है जिससे व्यवहार में हमने जो अपनाया, उसे हमने सिद्धांतत: अस्वीकृत कर दिया। एक संघ में इकाईयों को संप्रभुता होती है। ये स्वेच्छा से एक समझौते के जरिए अपनी संप्रभुता संघ को सौंप देते हैं। शायद ऐसा है कि वे अपने सभी अधिकार सौंप दें और जिससे केन्द्र को संप्रभुता हासिल होती है। लेकिन ये शक्तियां संघ को दी जाती हैं। संघ की अपनी कोई शक्ति नहीं है। इस प्रकार संघीय व्यवस्था में राज्यों को मूलभूत शक्ति माना जाता है, और केन्द्र मात्र राज्यों को संघ होता है। यह सत्य के विपरीत है। यह भारत की एकता और अखंडता के विपरीत है। इसमें हमारी मातृभूमि, हमारी भारत माता के विचार को कोई मान्यता नहीं दी गई है जो हम सबके दिलों में बसती हैं।

संविधान के पहले पैरा के अनुसार, “इंडिया जो कि भारत है राज्यों का संघ होगा”, अर्थात् बिहार माता, बंग माता, पंजाब माता, कन्नड़ माता, तमिल माता, ये सभी मिलकर भारत माता बनाते हैं। यह हास्यास्पद है। हमें सिखाया गया है कि प्रान्त भारत माता के अंग हैं, अलग-अलग मां नहीं। इसलिए हमारा संविधान संघीय होने की बजाय एकात्मक होना चाहिए।

एकात्मक राज्य का अर्थ यह नहीं होता कि सभी शक्तियां केन्द्र में निहित हैं, जैसे कि परिवार के मुखिया के पास सभी शक्तियां नहीं होती फिर भी सभी काम उसके नाम पर ही किए जाते हैं। दूसरों के पास भी कार्यकारी शक्ति होती हैं। हमारे शरीर में भी, क्या आत्मा के पास सभी अधिकार होते हैं ? इस प्रकार एकात्मक राज्य का मतलब अत्याधिक निरंकुश केन्द्र नहीं होता न ही इसका मतलब प्रान्तों को समाप्त करने से है। प्रान्तों के पास बहुत सी कार्याकारी शक्तियां रहेंगी। यहां तक की प्रान्त के नीचे आने वाली इकाईयां जैसे जनपद, उनके पास भी पर्याप्त शक्तियां रहेंगी। पंचायतों के पास भी शक्ति रहनी चाहिए।

पारम्परिक रूप से पंचायतों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता था। पंचायतों को कोई समाप्त नहीं कर सकता। हालांकि, आज हमारे संविधान में पंचायतों के लिए कोई स्थान नहीं है। पंचायतों को कोई अधिकार नहीं है। वे राज्य की कृपा पर जीवित हैं। यह आवश्यक है कि उनकी शक्ति को मूलभूत माना जाए। इस तरह सत्ता का विकेन्द्रीकरण भी पूर्ण होगा। निचले स्तर तक सत्ता का बांटी जाएगी और पूरी तरह से विकेन्द्रीत होगी। इसी के साथ, ये सभी शक्तियां एकात्मक राज्य में केन्द्रीत होंगी।यह व्यवस्था धर्म के अनुसार होगी।
अगर हम धर्म की इस अवधारणा को आगे ले जाते हैं तो ना सिर्फ राज्य और राष्ट्र बल्कि पूरी मानवजाति की प्रकृति पर विचार करना होगा। दूसरे शब्दों में, राष्ट्र का संविधान प्राकृतिक कानून के विपरीत नहीं हो सकता। व्यवहार के ऐसे बहुत से मानदंड हैं जो कानून की किताबों में नहीं है लेकिन वे मौजूद हैं। कभी-कभी वे कानून से भी ज्यादा मजबूत और बाध्यकारी होते हैं। हमें माता-पिता का आदर करना चाहिए यह लिखित कानून नहीं है। रात – दिन नए कानून बना रही हमारी सरकारों ने इस पर कोई कानून नहीं बनाया है। फिर भी, लोग अपने माता-पिता का आदर करते हैं। जो ऐसा नहीं करते उनकी आलोचना होती है।

अगर कल किसी बहस में या अदालत में यह मुद्दा आता है, तो इसे सामान्य तौर पर स्वीकार किया जाएगा कि कम से कम जब तक किसी व्यक्ति के व्यस्क ना हो जाए , उसे अपने माता-पिता के निर्णय को मानना और उनका आदर करना चाहिए।

इस प्रकार मानव प्रकृति का मौलिक कानून हमारे लिए बहुत सी स्थितियों में व्यवहार करने का मानक तय करता है। हम इस कानून को ‘धर्म’ कहते हैं। अंग्रेजी में धर्म का सबसे नजदीकी शब्द है “Innate law या प्राकृतिक कानून” , और यह भी धर्म के पूरे अर्थ को व्यक्त नहीं करता, क्योंकि धर्म सर्वोच्य है इसलिए हमारा आदर्श राज्य को “धर्म राज्य” कहा गया। माना जाता है कि राजा को धर्म की रक्षा करनी चाहिए। प्राचीन समय में राज्याभिषेक के समय राजा तीन बार बार कहता था कि “ऐसी कोई सत्ता नहीं है जो मुझे दंड दे सके”। ( इसी तरह का दावा पश्चिमी देशों के राजाओं ने भी किया, कहा गया कि “राजा गलती नहीं कर सकता”, और इसलिए वहां भी राजा को कोई दंड नहीं दे सकता था)। इस पर, पुराहित एक छड़ी से राजा की पीठ पर मार कर कहता था, “नहीं, तुम के धर्म के अधीन शासन करने के लिए हो। तुम संप्रभु नहीं हो”। राजा यज्ञ वेदी के चारों तरफ भागता था और पुरोहित उसके पीछा करते हुए उसको छड़ी से मारता था। तीन चक्कर लगा लेने के बाद यह विधि समाप्त होती थी इसतरह राजा को स्पष्ट रुप से बता दिया जाता था कि तुम दंड से मुक्त और संप्रभु नहीं हो। धर्म उससे ऊपर था, इतना कि वह भी धर्म के अधीन था।

क्या लोग जो चाहे कर सकते हैं? दलील दी जाती है कि लोकतंत्र का मतलब यही है। लोग जो चाहे कर सकते हैं। लेकिन हमारे देश में, लोग चाह कर भी धर्म के विपरीत काम नहीं कर सकते। एक बार एक पुजारी से पूछा गया, “अगर भगवान सर्वशक्तिशाली हे तो क्या वह धर्म के विपरीत काम कर सकता है। अगर वह ऐसा करता है ,तो वह सर्वशक्तिमान नहीं है”। यह एक दुविधा की स्थिति थी। क्या भगवान अधर्म कर सकते हैं या वह सर्वशक्तिमान नहीं है? वास्तव में भगवान धर्म के विपरीत काम नहीं कर सकते। अगर वह करते हैं, तो वह सर्वशक्तिमान नहीं है।

अधर्म ताकत नहीं कमजोरी की निशानी है। अगर अग्नि गर्मी देने के बजाए बुझ जाए तो वह ताकतवर नहीं है। ताकत अनियंत्रित व्यवहार में नहीं बल्कि नियंत्रित होकर काम करने में है। इसलिए भगवान सर्वशक्तिमान होने के साथ नियंत्रित भी हैं और फलस्वरुप पूरी तरह धर्म के साथ हैं। भगवान मनमानी करने के लिए नहीं बल्कि अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना के लिए मानव रूप में आते हैं। इस प्रकार भगवान सब कुछ कर सकते हैं लेकिन धर्म के विपरीत व्यवहार नहीं कर सकते। लेकिन गलत नहीं समझा जाए तो कहा जा सकता है कि धर्म भगवान से भी बड़ा है। ब्रह्मांड टिका है क्योंकि वह धर्म के अनुसार व्यवहार करता है। राजा को विष्णु का प्रतीक माना जाता था और इस रूप में वह धर्म राज्य का प्रमुख संरक्षक था।

धर्म राज्य का मतलब धार्मिक राज्य (theocratic state) से नहीं है। इस बिंदु को सही से समझते हैं, जहां किसी खास संप्रदाय और उसके पैगम्बर या गुरू को सर्वोच्य माना जाता हो, वह धार्मिक राज्य (theocratic state) है। यहां सभी अधिकार संप्रदाय विशेष के लोगों के पास होते हैं। दूसरे या तो उस देश में रह नहीं सकते या फिर गुलामों की तरह दूसरे दर्जे के नागरिक बन कर रहते हैं। रोम के पवित्र साम्राज्य का आधार यही था। “खिलाफत” का के पीछे भी यही विचार था। पूरे विश्व में मुस्लिम शासक खलीफा के नाम पर शासन करते थे। प्रथम विश्व युद्ध के बाद यह समाप्त हुआ। अब इसको पुनर्जीवित करने के प्रयास हो रहे हैं। पाकिस्तान सबसे नया धार्मिक राज्य है।

वे खुद को इस्लामी राज्य कहते हैं। वहां मुसलमानों के अलावा सभी दूसरे दर्जे के नागरिक हैं । इस अंतर के अलावा पाकिस्तान के प्रशासन में इस्लाम का कोई चिन्ह नहीं दिखाई देता। कुरान, मस्जिद, रोज़ा, ईद, नमाज़ आदि भारत में पाकिस्तान दोनों में ही एक तरह के हैं। राज्य और पंथ को जोड़ने की कोई जरुरत नहीं है। इस तरह के जुड़ाव से किसी व्यक्ति की भगवान की पूजा करने की क्षमता किसी तरह से बढती नहीं है। इसका एक ही नतीजा होता है कि राज्य अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर पाता। यह धर्म राज्य में नहीं होता। इसके बजाए वहां सबको उनके पंथ के अनुसार पूजा करने की स्वतंत्रता होती है।

धार्मिक राज्य में एक ही पंथ को सभी अधिकार और फायदे मिलते हैं, और दूसरे पंथो पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से बंधन लगाए जाते हैं। धर्म राज्य शांति, खुशी और व्यक्ति के विकास में पंथ की भूमिका को स्वीकार करता है। इसलिए राज्य का जिम्मेदारी होती है कि वह इस तरह का वातावरण तैयार करे कि जिसमें हर व्यक्ति अपनी पसंद के पंथ का पालन करते हुए शांति से रह सके। स्वतंत्रता की अपनी अंतर्निहित सीमा होती है।

मुझे अपना हाथ हिलाने की आजादी है, लेकिन जैसे ही मेरा हाथ किसी की नाक से टकराने लगे तो मेरी स्वतंत्रता वहीं खत्म हो जाती है। मुझे मेरे हिलते हाथ से किसी की नाक पर चोट करने का अधिकार नहीं है।

जहां दूसरे की स्वतंत्रता का हनन होने की संभावना हो वहां मेरी स्वतंत्रता खत्म हो जाती है। दोनों ही तरफ के लोगों की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसी तरह हर पंथ को बने रहने की स्वतंत्रता है। लेकिन यह स्वतंत्रता तभी तक है जब तक यह दूसरे पंथ पर अतिक्रमण नहीं करता। अगर अतिक्रमण जारी रहता है तो स्वतंत्रता का दुरुपयोग मानकर निंदा की जानी चाहिए और इसे समाप्त होना चाहिए। इस तरह सीमा जीवन के हर पहलू पर लागू होनी चाहिए। धर्म राज्य पंथ की स्वतंत्रता देता है और यह धार्मिक राज्य नहीं है।

आजकल धार्मिक राज्य के विरुद्ध सेक्यूलर स्टेट शब्द का प्रयोग किया जा रहा है। इस शब्द का प्रयोग पश्चिम की नकल है। हमें इसकी कोई जरुरत नहीं है। हम पाकिस्तान से अलग दिखाने के लिए इसे सेक्यूलर स्टेट कहते हैं। इससे कुछ गलतफ़हमी पैदा होती है। पंथ को धर्म के बराबर रखा जाता है और तब सेक्यूलर स्टेट का मतलब हो गया बिना धर्म का राज्य। कुछ कहते हैं कि हमारा राज्य ( बिना धर्म ) का है, जबकि कुछ ने ज्यादा बेहतर शब्द खोजा और इसे धर्मनिरपेक्षता का नाम दिया।
लेकिन ये सभी शब्द मौलिक रुप से गलत हैं। राज्य ना तो बिना धर्म के रह सकता है और ना ही धर्म को लेकर निरपेक्ष रह सकता है जैसे अग्नि ताप से निरपेक्ष नहीं रह सकती। अगर अग्नि से ताप निकल जाएगा तो वह अग्नि नहीं रहेगी। राज्य का तो काम है कि कानून और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए धर्म को बनाए रखे, वह राज्य धर्महीन या धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता। धर्महीन राज्य में कानून और व्यवस्था नहीं रहेगी, और जहां कानून और व्यवस्था नहीं होगी, वहां राज्य के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाएगा? दूसरे शब्दों में कहें तो धर्म और राज्य आपसी में विरोधी हैं।

राज्य केवल धर्म राज्य ( धर्म का राज्य ) ही हो सकता है और कुछ नहीं। दूसरी कोई भी परिभाषा राज्य के अस्तित्व में आने के कारण की विरोधाभासी होगी।
धर्म राज्य में, राज्य निरंकुश सत्ता नहीं होती। यह धर्म के अधीन होती है। हमने हमेशा धर्म को सर्वोच्य स्थान दिया है।

हाल ही में एक विवाद खड़ा हुआ कि संसद सर्वोच्य है या उच्चतम न्यायालय? विधायिका बड़ी है या न्यायपालिका? यह इस तरह का विवाद है कि दांया हाथ महत्वपूर्ण है या बांया ? दोनों ही शरीर के अंग हैं, जैसे विधायिका और न्यायपालिका हैं। दोनों के अलग-अलग काम है, और अपने क्षेत्र में दोनों ही सर्वोच्य हैं। किसी को दूसरे के ऊपर रखना गलती होगी। फिर भी विधायिका कहती है, “हम बड़े हैं”, दूसरी तरफ न्यायपालिका के लोगों का कहना है कि उनका स्थान ऊंचा है, क्योंकि वे विधायिका के बनाए कानून का व्याख्या करते हैं।

विधायिका कहती है कि न्यायपालिका को अधिकार हमने दिए हैं। जरूरत होने पर , विधायिका संविधान को बदल सकती है। इसलिए वह सर्वोच्य है। अब क्योंकि शक्ति संविधान के द्वारा दी गई है तो वे संविधान को बदलने की बात करते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि अगर बहुमत से संविधान को बदल भी दिया जाता है तो भी यह धर्म के विरुद्ध होगा। सच्चाई यह है कि विधायिका और न्यायपालिका दोनों ही समान धरातल पर हैं। ना ही विधायिका बड़ी है और ना ही न्यायपालिका। धर्म दोनों से बड़ा है। विधायिका को धर्म के अनुसार काम करना होगा और न्यायपालिका को भी धर्म के अनुसार काम करना होगा। धर्म दोनों की सीमा तय करेगा। विधायिका, न्यायपालिका या जनता, इनमें से कोई सर्वोच्य नहीं है, कुछ लोग कहेंगे, क्यों! जनता सर्वोच्य है।

वे चुनाव करते हैं”, लेकिन जनता भी सर्वोच्य नहीं है क्योंकि जनता के पास भी धर्म के विरुद्ध काम करने का अधिकार नही है। अगर कोई सरकार लोगों को धर्म के विरुद्ध काम करने से नहीं रोकती , और ना ही उस काम के लिए दंड देती है, तो इस तरह की सरकार तो चोरों की सरकार है। कोई जनरल भी धर्म के विरुद्ध नहीं जा सकता। एक स्थिति की कल्पना करो कि किसी तरह चोरों को सरकार में बहुमत मिल जाता है और उनका ही चुना व्यक्ति कार्यपालिका में भी हो ! अगर बहुमत के लोग चोर हों और किसी चोर को शासन के लिए चुन लें तो अल्पसंख्यकों का क्या कर्तव्य होगा ? उनका कर्तव्य होगा कि वे बहुसंख्यकों के द्वारा चुने गए व्यक्ति को हटाएं।

द्वितीय विश्व युद्ध के समय हिटलर ने फ्रांस पर आक्रमण किया, फ्रांस की सेना नाज़ी फौजों को नहीं रोक पाई। फ्रांस के राष्ट्रपति मार्शन पेतां ने आत्मसमर्पण करने का निर्णय लिया। फ्रांस के लोगों ने निर्णय का समर्थन किया , लेकिन दिगाल लंदन भाग गए और वहां जाकर उन्होंने कहा कि वे आत्मसमर्पण का समर्थन नहीं करते। फ्रांस आज़ाद है और रहेगा। लंदन में उन्होंने फ्रांस की निर्वासित सरकार बनाई और आखिरकार फ्रांस को आज़ाद करवाया।

अब अगर बहुमत के निर्णय को सर्वोच्य माना जाए तो दिगाल के काम की आलोचना की जाएगी। उन्हें स्वतंत्रता के नाम पर लड़ने का कोई अधिकार नहीं था। दिगाल को यह अधिकार इसलिए मिला क्योंकि उन्होंने फ्रांस राष्ट्र को जनता के बहुमत के निर्णय से बढ़कर माना। राष्ट्र का धर्म सबसे बढ़कर है। स्वतंत्रता प्रत्येक राष्ट्र का धर्म है। राष्ट्र की स्वतंत्रता की रक्षा करना और खोने पर पुन: हासिल करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

यहां तक की हमारे देश में बहुत कम लोग अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हुए। कुछ क्रांतिकारी , कुछ बहादुर लोग खड़े हुए और उन्होंने लड़ाई लड़ी । लोकमान्य तिलक ने कहा कि “स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है”। उन्होंने यह घोषणा बहुमत के समर्थन या जनमत के निर्णय से नहीं की। आजकल लोग इस बात का समर्थन कर रहे हैं कि गोवा के विलय का निर्णय जनमत से किया जाए, , कश्मीर का निर्णय जनमत से किया जाए। यह गलत है। राष्ट्र एकता हमारा कर्तव्य है। इस विषय से जुड़े मसलों का निर्णय जनमत से नहीं किया जा सकता। इस तरह के निर्णय पहले ही प्रकृति ने कर दिए हैं। चुनाव और बहुमत से सरकार का निर्णय किया जा सकता है। लेकिन सच का निर्णय बहुमत से नहीं किया जा सकता। सरकार को क्या करना है इसका निर्णय धर्म से ही होगा।

आप सभी जानते हैं कि अमेरिका में जहां वे लोकतंत्र की शपथ लेते हैं, वहां एक समय लिंकन ने गलत जनमत को स्वीकार नहीं किया था। दास प्रथा को हटाने के खिलाफ जब दक्षिणी राज्यों ने अलग होने की मंशा जाहिर की तो लिंकन ने दृढ़ता से उनको कहा कि , “आपका लोकतंत्र में भी अलग होने का अधिकार नहीं है। ” लिकंन ने इसके खिलाफ लड़ाई लड़ी और उनको अलग नहीं होने दिया। उन्होंने दास प्रथा को भी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने किसी तरह का समझौता नहीं किया जबकि वह चाहते तो आंशिक दास प्रथा को स्वीकार करके दक्षिणी राज्यों अपने साथ बनाए रख सकते थे।

उन्होंने आधा रास्ते पर पहुंचने को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि दास प्रथा उस परंपरा, धर्म , सिद्धांत के विरुद्ध है जिनके आधार पर अमेरिका का निर्माण किया गया है। इसलिए दास प्रथा को समाप्त करना ही होगा। जब दक्षिणी राज्यों ने अलग होने का निर्णय लिया तो उन्होंने उनसे कहा “तुम अलग नहीं हो सकते”। इस मुद्दे को लेकर गृहयुद्ध हुआ और लिंकन ने अधर्म के साथ समझौता नहीं किया।

हमारे देश में स्थिति बहुत कुछ पुराने हिन्दु विवाह की तरह है जहां दोनों के चाहने के बाद भी विवाहित जोड़ा तलाक नहीं ले सकता। इसके पीछे सिद्धांत यह है कि उनका व्यवहार उनकी रुचि नहीं बल्कि उनके धर्म से नियंत्रित होना चाहिए। यही स्थिति राष्ट्र की भी है। अगर कश्मीर के चालीस लाख लोग कहें हैं कि वे अलग होना चाहते हैं, अगर गोवा के लोग कहें कि वे अलग होना चाहते हैं, या कुछ लोग कहें कि वे फिर से पुर्तगाल का शासन चाहते हैं तो यह सब धर्म के विरुद्ध है। भारत के की पूरी आबादी के 99.99 फीसदी लोग भी धर्म के विरूद्ध कुछ चुनते हैं तो भी उस बात को कभी सत्य नहीं माना जाएगा।

दूसरी तरफ , अगर व्यक्ति भी किसी चीज के लिए खड़ा होता है जो धर्म के अनुसार है तो उसे सत्य माना जाएगा, क्योंकि सच धर्म के साथ रहता है। यह उस एक व्यक्ति का कर्तव्य है कि सत्य के आधार पर चले और लोगों को बदले।

हमें यह साफतौर पर समझना होगा कि आवश्यक नहीं कि धर्म बहुमत या लोगों के साथ हो। धर्म शाश्वत है। इसलिए, लोकतंत्र की परिभाषा में यह कहना कि यह लोगों की सरकार है पर्याप्त नहीं है। इसे लोगों के भले के लिए होना चाहिए। लोगों के भले का क्या मतलब है ? यह धर्म तय कर सकता है। इसलिए, एक लोकतांत्रिक सरकार “जन राज्य” की जड़ें धर्म में निहित होनी चाहिए जिसका अर्थ होगा एक “धर्म राज्य” । लोकतंत्र की परिभाषा के अनुसार, “ लोकतांत्रिक सरकार लोगों की, लोगों के द्वारा और लोगों के लिए होती है”, लोगों की सरकार इससे स्वतंत्रता का पता चलता है, लोगों के द्वारा शब्द से लोकतंत्र का पता चलता है, और लोगों के लिए इस शब्द से धर्म का पता चलता है। इसलिए, सच्चा लोकतंत्र वही है जहां स्वतत्रंता और धर्म दोनों होते हैं, जिनमें लोकतंत्र की सभी अवधारणाएं निहित होती हैं।

एकात्म मानववाद – अध्याय 4

कल हमने एक राष्ट्र में राज्य के कार्यों के बारे में चर्चा की थी। भारतीय परंपराओं के अनुसार, राष्ट्र एक जैविक इकाई है जो स्वंय अस्तित्व में आई और जिसे लोगों के किसी समूह ने नहीं बनाया । राष्ट्र अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति और अपने भीतर की मौलिक प्रकृति को मूर्त रूप देने के लिए कई तरह की संस्थाओं का निर्माण करता है। राज्य उनमें से एक संस्था है जो महत्वपूर्ण तो है लेकिन सर्वोच्य नहीं है।

हमारे साहित्य में जहां राजा के कर्तव्यों के बारे में बताया गया है वहीं उसके महत्व को भी स्वीकार किया गया है। शायद राजा को उसकी अपार जिम्मेदारी का एहसास दिलाने के लिए ऐसा किया गया। वह लोगों के चरित्र और जीवन पर गहरा असर डालता था। इसलिए उसे अपने व्यवहार पर बेहद ध्यान देना पड़ता था। भीष्म ने महाभारत में यही बात कही है, जब उनसे पूछा गया कि परिस्थितियां राजा को बनाती हैं या राजा परिस्थितियों का निर्माण करता है।

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि राजा परिस्थितियों को आकार देता है। अब कुछ लोग कहेंगे कि इसका मतलब है कि राजा को सर्वोच्य समझा जाता था। लेकिन यह सत्य नहीं है। उन्होंने यह नहीं कहा था कि राजा धर्म से ऊपर है। यह सत्य है कि राजा गहरा प्रभाव डालता था। और वह समाज में धर्म की रक्षा करता था लेकिन इसके बावजूद धर्म में क्या शामिल होगा इसका निर्णय वह नहीं कर सकता था। वह केवल यह देखता था कि लोग धर्म के अनुसार जीवन यापन करें। इस तरह वह वर्तमान समय के कार्यपालिका की तरह था।
आजकल राज्य में कानून का पालन करवाना कार्यपालिका की जिम्मेदारी है, लेकिन कार्यपालिका कानून का निर्माण नहीं करती। जब कार्यपालिका ईमानदारी और कुशलता से काम नहीं करती तो कानूनों का पालन भी नहीं होता जैसा हम आज चारों तरफ देख रहे हैं। यह कहा जा सकता है कि “वर्तमान बुराईयों के लिए कार्यपालिका काफी हद तक जिम्मेदार है।”

आखिर निषेध नाकाम क्यों रहा ? नाकामी के लिए कौन जिम्मेदार है ? जब निषेध को लागू करवाने वाले लोग अवैध शराब बेचने वालों से भत्ता लेने लगें तो निषेध कैसे सफल होगा ?

इसलिए, कार्यपालिका कानून के सही पालन के लिए जिम्मेदार है। भीष्म के कथन का यही मतलब है। इसे राजा की सर्वोच्यता की स्वीकार्यता नहीं समझा जाना चाहिए। अगर ऐसा था तो निरंकुश शासक वेणु को ऋषियों ने हटा कर पृथु को राजा कैसे बना दिया?

ऋषियों के इस आचरण की इतिहास में कहीं भी आलोचना नहीं की गई। इसके विपरीत सबने इसकी प्रशंसा की। जब धर्म की सर्वोच्यता को सिद्धांत के तौर पर स्वीकार किया जाता है तो धर्म से मिले अधिकार से फलस्वरूप , ऋषियों को कर्तव्य पूरा करने में विफल रहने वाले राजा को हटाने का अधिकार मिल जाता है। अन्यथा, सिंहासन से किसी राजा को हटाना पूरी तरह से गैरकानूनी होता। तो अगर राजा धर्म के अनुसार कार्य नहीं करता तो उसे हटाना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होता है।

पश्चिमी देशों में, या तो राजा को दूसरे राजा ने हटा दिया या लोगों ने राजा की संप्रभुता को पूरी तरह से नकार दिया। उनके यहां राजा भगवान का प्रतिनिधि था और उसे कम से कम सिद्धांत के हिसाब से किसी भी तरह हटाया नहीं जा सकता था ।

हमारी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में, राजा और राज्य को कभी सर्वोच्य नहीं माना गया। इतनी ही नहीं, सामाजिक जीवन को आगे बढ़ाने और नियंत्रित करने के लिए दूसरी महत्वपूर्ण संस्थाएं भी थी ( राज्य उन संस्थाओं में से केवल एक संस्था था)। उन संस्थाओं को क्षैतिज और उर्ध्वाधर दोनों स्तरों पर व्यवस्थित किया गया था अर्थात् उन्हें मौलिक और आजीविका दोनों आधार पर बनाया गया था। हमारे यहां पंचायतों और जनपद सभाओं का विकास हुआ।

शक्तिशाली राजाओं ने भी कभी पंचायतों को परेशान नहीं किया। इसी प्रकार व्यापार के आधार पर संघ बने हुए थे। इन दोनों को कभी राज्य ने परेशान नहीं किया, इसके विपरीत उनकी स्वायत्तता को मान्यता दी गई। उन्होंने अपने क्षेत्र के लिए स्वंय के नियम और कायदे बनाए। अलग-अलग समुदायों की पंचायतों, धार्मिक स्थलों, निगमों, गांव पंचायतों, जनपद सभाओं और इस तरह की दूसरी संस्थाएं अपने नियम बनाया करती थी। राज्य का काम यह देखना होता था कि लोग इन नियमों का पालन करें। राज्य कभी इन संघों के काम में हस्तक्षेप नहीं करता था। इस तरह राज्य सामाजिक जीवन के कुछ ही पहलुओं से संबंध रखता था।

इसी तरह आर्थिक क्षेत्र में भी बहुत सी संस्थाएं बनी। हमें हमारी आर्थिक संरचना की प्रकृति के बारे में सोचना होगा। हमें इस प्रकार की आर्थिक व्यवस्था चाहिए जो हमारे मानवीय गुणों, या सभ्यता के विकास में सहयोग करने के साथ ही हमें सभी क्षेत्रों में ऊपर उठने में मदद करे। हमे इस तरह की व्यवस्था चाहिए जो हमारे मानवीय गुणों को खत्म नहीं करे, और हमें व्यवस्था का गुलाम नहीं बनाए। हमारे सिद्धांत के अनुसार, विकास के फलस्वरूप व्यक्ति भगवान की तरह पूर्णता पा लेता है। अगर हम इस लक्ष्य को पाना चाहते हैं तो हमारी आर्थिक व्यवस्था की संरचना और नियम कैसे होने चाहिए? चलिए इस प्रश्न पर विचार करते हैं।

आर्थिक व्यवस्था के जरिए उन सभी बुनियादी चीजों का उत्पादन होना चाहिए जो व्यक्ति के विकास और रखरखाव के साथ-साथ राष्ट्र के विकास और सुरक्षा के लिए जरूरी हैं। बुनियादी जरूरतों की पूर्ति के बाद स्वाभाविक रुप से यह प्रश्न उठता है कि क्या ज्यादा खुशी और समृद्धि के लिए हमें ज्यादा उत्पादन करना चाहिए ? पश्चिमी समाज में व्यक्ति की आवश्यकताओं और इच्छाओं को व्यवस्थित तरीके से बढ़ाते रहने को बेहद जरुरी माना जाता है। इसकी कोई ऊपरी सीमा नहीं है।

सामान्यत इच्छाओं के होने पर इच्छित वस्तु का उत्पादन करने के प्रयास किए जाते हैं। लेकिन आजकल स्थिति विपरीत है। आजकल उत्पादित की जा रही वस्तुओं को इस्तेमाल करने की इच्छा लोगों में पैदा की जाती है। मांग को पूरा करने के लिए उत्पादन करने की बजाए, पहले से उत्पादित की जा चुकी वस्तुओं का बाजार बनाने की कोशिश की जाती है, और अगर वस्तु की मांग पैदा नहीं होती तो मांग को पैदा करने के व्यवस्थित प्रयास किए जाते हैं।

यह पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था की प्रमुख विशेषता बन गई है। पहले, मांग होने पर उत्पादन होता था, अब उत्पादन के बाद मांग पैदा की जाती है। उदाहरण के लिए चाय को लेते हैं। चाय का उत्पादन किया गया क्योंकि लोग चाहते थे । लेकिन चाय के उत्पादन के बाद हमें उसका इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया गया। अब चाय आम आदमी का पेय बन चुकी है। यह हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी है।

ऐसा की वनस्पति घी के साथ भी है। क्या कोई कभी इसको इस्तेमाल करना चाहता था ? पहले इसका उत्पादन किया गया और उसके बाद हमें इसका इस्तेमाल सिखाया गया। अगर बनाए गए सामान का इस्तेमाल नहीं होगा, तो मंदी आएगी।

हम लोगों में से बहुतों को 1930-32 की महान आर्थिक मंदी याद होगी। उस समय चीजों की अधिकता थी लेकिन मांग नहीं थी। इसलिए कारखाने बंद हो गए। चारों तरफ दिवालियापन और बेरोजगारी दिखाई देने लगी। इसलिए आज इस बात की बहुत जरूरत है कि जो भी उत्पादन है उसका प्रयोग जरूर किया जाए।

अंग्रेजी साप्ताहिक, “ऑर्गेनाइजर” के संपादक कुछ समय पहले अमेरिका गए। वापस आने पर उन्होंने एक मनोरंजक वाकया बताया।

वहां एक कारखाना आलू छीलने की मशीन बनाता था। कारखाने का उत्पादन मांग से ज्यादा हो गया। कारखाने के प्रंबधको को ऐसा कोई रास्ता खोजना में परेशानी आ रही थी जिससे लोगों को आलू छीलने की मशीन खरीदने के लिए उकसाया जा सके। उन्होंने कंपनी के सभी सेल्समैनों की बैठक बुलाई। सबने अपने सुझाव रखे, उनमें से एक सुझाव यह था कि मशीन के हत्थे का रंग आलू के छिलके जैसा हो जिससे गलती से मशीन भी छिलकों के साथ कचरे में फेंक दी जाए।

इस तरह मांग बढ़ सकती है। इसके साथ ही उत्पाद को आकर्षक पैकिंग में दिया जाता है। साफ है कि यह आर्थिक व्यवस्था ना केवल उपभोग पर आधारित है बल्कि विनाश की तरफ भी जा रही है। लोगों की आवश्यकता और मांग की पूर्ति करने की बजाय ,पुराने को फेंको और नया खरीदो ! मांग पैदा करना आधुनिक अर्थव्यवस्था का लक्ष्य बन गया है। मान लेते हैं कि हमें प्राकृतिक संसाधनों की सीमित आपूर्ति की चिंता करने की जरूरत नहीं है फिर भी प्रकृति में संतुलन का सवाल तो खड़ा होता है।

प्रकृति के विभिन्न अंगों के बीच एक संबंध है। अगर एक दूसरे के सहारे से खडी तीन डंडियों में से एक को हटा दिया जाए तो शेष बची दो अपने आप ही गिर जाएंगी। वर्तमान आर्थिक और उत्पादन व्यवस्था तेजी से प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं। जिसका नतीजा है कि एक तरफ लगातार बढ़ती इच्छाओं की पूर्ति के लिए नए उत्पाद बनाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रतिदिन नई समस्याएं खड़ी हो रही हैं जो संपूर्ण मानवता और सभ्यता के अस्तित्व के लिए खतरा हैं।

इसलिए जरूरी है कि उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के उतने हिस्से का ही प्रयोग किया जाए जिसकी भरपाई प्रकृति आसानी से कर सके। फल लेने पर फल के पेड़ को नुकसान नहीं होता। यह पेड़ के लिए शायद लाभदायक ही होता है। हालांकि, ज्यादा फसल लेने के लिए जमीन पर रासानिक उर्वरकों का प्रयोग किया जा रहा है जिसका परिणाम होगा कि जमीन कुछ ही समय में अनुपजाऊ हो जाएगी। इस कारण से अमेरिका में लाखों एकड़ जमीन बंजर हो गई है। विनाश का यह नाच कब तक चल सकता है ?

खराब मशीनों को बदलने के लिए मूल्य ह्वास का प्रावधान किया जाता है। तो हम प्रकृति के लिए मूल्य ह्वास को कैसे नकार सकते हैं। हमें यह समझना होगा कि हमारी आर्थिक व्यवस्था का लक्ष्य संसाधनों का असंमित इस्तेमाल नहीं बल्कि नियंत्रित इस्तेमाल होना चाहिए। एक उद्देश्यपूर्ण, खुशी से भरपूर और उन्नत जीवन के लिए भौतिक साधन जरुरी हैं, जो भगवान ने हमें पर्याप्त मात्रा में दिए हैं।

उपभोग और उत्पादन की अंधी दौड़ में शामिल होना बुद्धिमानी नहीं होगी, उससे लगता है जैसे मानव को मात्र उपभोग के लिए बनाया गया है। इंजन को सही तरह से काम करने के लिए कोयले की जरुरत होती है, लेकिन इसे मात्र कोयले के उपभोग के लिए नहीं बनाया गया है, बल्कि इसके विपरीत इसका काम है कि कम से कम कोयले के इस्तेमाल से अधिकतम ऊर्जा कैसे हासिल की जाए।

यह आर्थिक दृष्टिकोण है। मानव जीवन के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, हमें प्रयास करना चहिए कि न्यूनतम इंधन में अधिकतम गति से लक्ष्यों को कैसे हासिल किया जाए। इस तरह की व्यवस्था को सभ्यता कहा जा सकता है। यह व्यवस्था मानव जीवन के मात्र एक पहलू के बारे में नहीं सोचती बल्कि अंतिम लक्ष्य सहित जीवन के सभी पहलुओं का ध्यान रखती है।

यह व्यवस्था प्रकृति के शोषण पर नहीं बल्कि प्रकृति को बनाए रखने से जुडी होगी, और बदले में उसका स्वंय का भी पालन पोषण होगा।

अगर आर्थिक व्यवस्था इस तरह के मानवीय पहलू से प्रेरित होगी तो आर्थिक प्रश्नों के लेकर हमारी सोच पूरी तरह से बदल जाएगी। पश्चिम की अर्थव्यवस्था चाहे वह पूंजीवादी हो या समाजवादी, उसमें मूल्य को महत्वपूर्ण और केन्द्रीय स्थान दिया गया है। सभी आर्थिक विचार मूल्य के चारों तरफ केन्द्रित हैं।

हो सकता है कि एक अर्थशास्त्री के नजरिए से मूल्य बहुत महत्वपूर्ण हो लेकिन, वे दर्शशास्त्री जो पूरी तरह से मूल्य पर आधारित हैं अधूरे, अमानवीय और कुछ हद तक अनैतिक हैं। उदाहरण के लिए, एक नारा आजकल बहुत सुना जाता है “प्रत्येक को अपनी रोटी खुद कमानी चाहिए”। आमतौर पर साम्यवादी इस नारे का बहुत प्रयोग करते हैं लेकिन मूलरूप से पूंजीवादी भी इस नारे से असहमति नहीं रखते।

दोनों में अंतर बस इस बात को लेकर है कि कौन कमाता है और कितना कमाता है। पूंजीवादी सोचते हैं कि पूंजी और उद्योग उत्पादन के महत्वपूर्ण घटक हैं, इसलिए अगर वे लाभ का बड़ा हिस्सा लेते हैं तो उन्हें लगता है कि यह उनका ही हिस्सा है। दूसरी तरफ, साम्यवादी उत्पादन के लिए केवल कामगार वर्ग को महत्वपूर्ण मानते हैं। इसलिए वे उत्पादन का बड़ा हिस्सा कामगारों को देते हैं। दोनों की विचार सही नहीं हैं। सही मायने में हमारा नारा होना चाहिए कि जो कमाता है वह खिलाएगा और प्रत्येक व्यक्ति के पास पर्याप्त भोजन होगा।

भोजन का अधिकार जन्मसिद्ध अधिकार है। कमाने की क्षमता शिक्षा और प्रशिक्षण से आती है। यहीं तक की नहीं कमाने वाले को भी एक समाज में भोजन मिलना चाहिए। बच्चे, बुजुर्ग, रोगी , और अशक्त इन सभी की जिम्मेदारी समाज को लेनी चाहिए। आमतौर पर समाज इस जिम्मेदारी को निभाता है। मानव जाति के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का मापदण्ड इस जिम्मेदारी को उठाने की उसकी तत्परता से लगाया जा सकता है। इस कार्य के लिए आर्थिक व्यवस्था में स्थान होना चाहिए। विज्ञान के तौर पर समझे जाने वाली अर्थव्यवस्था में इस जिम्मेदारी के लिए स्थान नहीं है। एक व्यक्ति केवल स्वंय के खाने की पूर्ति के लिए नहीं कमाता है, बल्कि इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए भी कमाता है। अन्यथा जिन लोगों को भोजन मिल चुका है वे आगे काम नहीं करेंगे।

किसी भी आर्थिक व्यवस्था को मानव जीवन की न्यूनतम बुनियादी जरूरतों को अवश्य पूरा करना चाहिए। मोटे तौर पर भोजन, कपड़ा और मकान बुनियादी जरूरते हैं। इसी तरह, व्यक्ति को शिक्षित करना समाज की जिम्मेदारी है जिससे वह व्यक्ति समाज के प्रति अपनी दायित्वों को निभा सके। किसी व्यक्त के बीमार होने पर समाज को उसके इलाज और भरण-पोषण की व्यवस्था करनी चाहिए।

अगर सरकार इन न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करती है तो सही मायने में धर्म का राज होगा। नहीं तो यह अधर्म का राज होगा। रघुवंश में राजा दिलिप के बारे में वर्णन करते हुए कालीदास कहते हैं “अपनी प्रजा के भरण-पोषण, सुरक्षा और शिक्षा के लिए जिम्मेदार होने के नाते, वह उनके सच्चे पिता थे। दूसरे लोग तो उन सभी को जन्न देन कि निमित्त मात्र थे”। राजा भरत जिनके नाम पर हमारे देश का नाम पड़ा है, उनके बारे में भी कुछ ऐसा ही वर्णन है, “अपनी प्रजा की सुरक्षा और भरण-पोषण करने के कारण उन्हें भरत कहा गया।” यह भारत देश उनका है, अगर इस देश में भरण-पोषण और सुरक्षा की गारंटी नहीं है, तो इसका मतलब है कि भारत नाम निरर्थक हो गया।

शिक्षा- एक सामाजिक जिम्मेदारी

एक बच्चे को शिक्षित करना खुद समाज के हित में है। जन्म से बच्चा एक पशु होता है। शिक्षा और संस्कृति से वह समाज का जिम्मेदार नागरिक बनता है। जो काम समाज के अपने हित में हो उसके लिए शुल्क लेना अजीब लगता है। अगर शुल्क नहीं दे पाने के कारण बच्चों को शिक्षा नहीं मिल पाती है, तो क्या समाज लंबे समय तक इस स्थिति को सहन कर पाएगा। बीज बोने और उसकी देखभाल के लिए हम पेड़ से शुल्क नहीं लेते। इसके विपरीत हम अपना पैसा लगाते हैं और प्रयत्न करते हैं। हम जानते हैं कि बड़े होने पर पेड़ से फल मिलेंगे।

शिक्षा इसी तरह का निवेश है। एक शिक्षित व्यक्ति सचमुच समाज की सेवा करेगा। दूसरी तरफ अपने हाल पर छोडे गए लोग समाज के प्रति उदासीन हो जाते हैं। 1947 से पहले, भारते की रियासतों में शिक्षा के लिए कोई शुल्क नहीं लगता था। ऊच्च शिक्षा भी मुफ्त थी। गुरुकुलों में, भोजन और आवास के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। छात्र “भिक्षा” के लिए समाज के पास जाया करते थे। कोई भी घर भिक्षा देने से मना नहीं करता था। दूसरे शब्दों में कहें तो समाज शिक्षा का खर्च उठाता था।

इसी तरह, चिकित्सा के लिए पैसे देने पडें यह जान कर आश्चर्य होता है। असल में , चिकित्सा भी मुफ्त होनी चाहिए जैसा कि पहले इस देश में थी। आजकल तो व्यक्ति को मंदिरों में प्रवेश के लिए पैसा देना पड़ता है। तिरुपति के बालाजी मंदिर में जाने के लिए 25 पैसे लगते है। हालांकि, दोपहर में एक घंटे के लिए धर्म दर्शन होता है जिसका कोई पैसा नहीं लगता, जैसे दूसरे समय में अधर्म दर्शन होता हो। समाज को सभी सदस्यों के भरण-पोषण और विकास से जुड़ी न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने की गारंटी देनी चाहिए। अब प्रश्न उठता है कि अगर प्रत्येक व्यक्ति को न्यूनतम आवश्यकता पूर्ति की गांरटी दी जाएगी को इसके लिए संसाधन कहां से आएंगें ?

काम की गारंटी

स्पष्ट है कि संसाधन हमारे प्रयासों से ही आने चाहिए। इसलिए जहां न्यूनतम आवश्यकता पूर्ति का अधिकार दिया गया है वहां जो व्यक्ति संसाधनों को जुटाने के प्रयास में भागीदारी नहीं करता, वह समाज के लिए बोझ है। इसी तरह व्यक्ति की उत्पादन क्षमता में बाधा डालने वाली व्यवस्था भी आत्मघाती है। ऐसी व्यवस्था में व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों को निभा नहीं पाता। केवल यही नहीं, अगर प्रयास नहीं करने वाले व्यक्ति की आवश्यकताएं भी पूर्ण होती रहेंगी तो, तो उसके व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं होगा। एक मानव होने के नाते उसकी प्रगति विकृत और एकांगी होगी। मानव के पास पेट होने के साथ हाथ भी हैं। अगर उसके हाथों को काम नहीं मिलेगा तो आवश्यकताओं की पूर्ति होने के बाद भी उसे खुशी महसूस नहीं होगी।

उसका प्रगति बाधित हो जाएगी। जैसे एक बांझ महिला जीवन में खालीपन और असंतोष महसूस करती है वैसा ही बिना काम के मनुष्य के साथ होता है।

समाज में हर सक्षम व्यक्ति को काम देना हमारी आर्थिक व्यवस्था का लक्ष्य होना चाहिए। आज हम बहुत अजीब स्थिति का गवाह बन रहे हैं। एक तरफ, दस वर्ष का बच्चा और सत्तर वर्ष का बुजुर्ग कठोर परिश्रम कर रहे हैं तो दूसरी तरह पच्चीस वर्ष के युवा काम नहीं होने के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। हम इस कुप्रंधन को दूर करना होगा। भगवान ने प्रत्येक व्यक्ति को हाथ दिए हैं लेकिन हाथों में स्वंय उत्पादन करने की क्षमता कम होती है। उन्हें मशीनों के रुप में पूंजी की जरुरत होती है।

श्रम और पूंजी के बीच वैसा ही संबंध है जैसा मनुष्य और प्रकृति के बीच है। विश्व इन दोनों से मिलकर बना है। इनमें से किसी की अवहेलना नहीं की जा सकती।

पूंजी निर्माण

पूंजी निर्माण के लिए जरुरी है कि उत्पादन के कुछ हिस्से को तुरंत इस्तेमाल से बचाकर भविष्य में उत्पादन के लिए प्रयोग किया जाए। इस तरह उपभोग पर रोक लगाकर ही पूंजी का निर्माण किया जा सकता है। यह पूंजी निर्माण का आधार है जिसे कार्ल मार्क्स “अतिरिक्त मूल्य” कहते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था में उद्योगपति इस अतिरिक्त मूल्य के जरिए पूंजी निर्माण करते हैं। समाजवादी व्यवस्था में, यह काम राज्य करता है। दोनों ही व्यवस्थाओं में, पूरे उत्पादन को कामगारों में नहीं बांटा जाता है।

अगर बड़े पैमाने पर केन्द्रीकृत उद्योगों में उत्पादन किया जाता है तो पूंजी निर्माण में कामगार के त्याग को मान्यता नहीं दी जाती। विकेन्द्रीत व्यवस्था का लाभ यह है कि इसमे अतिरिक्त मूल्य या पूंजी के प्रबंधन में कामगार की सीधी भागीदारी होती है। मशीन पूंजी का सबसे आम स्वरुप है। उत्पादन में शारीरिक श्रम को कम करने और कामगार की उत्पादकता बढ़ाने के लिए मशीनों को बनाया गया। इस तरह मशीन कामगार की सहायक है उसकी प्रतियोगी नहीं।

हालांकि, जहां मानव श्रम को पैसे से खरीदे जाने वाली वस्तु समझा जाता है, वहां मशीन मानव की प्रतियोगी बन जाती है। पूंजावादी व्यवस्था की सबसे बडी खराबी यही दृष्टिकोण है जिसमें मशीन को मानव श्रम का प्रतियोगी बनाकर मानव को अभावों के साथ छोड़ दिया जाता है। ऐसे में मशीन के अविष्कार का उद्देश्य ही निरर्थक हो जाता है। इसके लिए मशीन को दोष नहीं दिया जा सकता। यह आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का दोष है जो उद्देश्य और साधन के बीच अंतर नहीं कर पाती। हमें मशीनों की उपयोगिता की सीमाओं का ध्यान रखकर उसका कहां उपयोग किया जाए इसका निर्धारण करना होगा।

इस दृष्टिकोण से पश्चिमी देशों से मशीनों का आयात करना एक बड़ी गलती होगी। पश्चिमी देशों में मानव श्रम की कमी के कारण मशीनों का विकास हुआ। समय और स्थान की स्वतंत्रता मशीन की खूबी नहीं है। मशीन आधुनिक विज्ञान की उपज हैं लेकिन उसकी प्रतिनिधि नहीं हैं। वैज्ञानिक ज्ञान पर किसी खास देश का एकाधिकार नहीं है। लेकिन इसका प्रयोग करते समय प्रत्येक देश की स्थितियों और जरुरतों को ध्यान में रखना होगा। हमारी मशीनें ना सिर्फ खास आर्थिक जरुरत के लिए बनें, बल्कि इस तरह से बनी हों कि हमारे सामाजिक-राजनैतिक और सांस्कृतिक लक्ष्यों के साथ किसी तरह का संघर्ष भी ना करें।

प्रोफेसर विश्वेशरैया ने अपनी एक किताब में कहा था, कि उत्पादन प्रणाली का विचार करते समय सात ‘M’ का ध्यान जरुर रखना चाहिए। ये है मैन ( Man), मैटीरियल (material,) मनी,(money), मैनेजमेन्ट (management,) मोटिव (motive) पावर (power), मार्केट ( market) and मशीन (machine)। कामगारों या जिनको काम की जरुरत है उनकी योग्यता और कौशल को ध्यान में रखना चाहिए। आवश्यक कच्चे माल की आसान उपलब्धता और उपलब्ध कच्चे माल की गुणवत्ता को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते। हमें यह भी सोचना होगा कि पूंजी के रुप में लगाने के लिए हमारे पास कितना धन है। यह पूंजी कैसे बढ़ेगी और किस दर से बढेगी ? अधिकतम उत्पादन के लिए इसका बेहतरीन प्रयोग कैसे करें ?

इसका कितना हिस्सा जमा सम्पत्ति के रुप में रखना चाहिए और कितना तरल रुप में रखना चाहिए ? मानव और पशु श्रम के अलावा देश में उपलब्ध ऊर्जा के दूसरे संसाधनों पर भी ध्यान देना चाहिए। हवा, पानी, भाप, गैस, बिजली, और परमाणु ऊर्जा से हमें जरुरी ऊर्जा मिल सकती है। हमें यह भी तय करना होगा कि इनमें से ऊर्जा के किस संसाधन का कितना प्रयोग करना है जिससे की उसे इस्तेमाल करना घाटे का सौदा नहीं बने। इसी तरह प्रबंधन की क्षमता भी महत्वपूर्ण है और इस पर ध्यान देना चाहिए।

अगर दर्जनों कामगारों के प्रयासों का समन्वय करने की क्षमता नहीं है तो सभी बेरोजगार रहेंगें। इसके साथ ही उत्पादित की जा रही वस्तुओं की समाज में उपयोगिता के बारे में सोचना भी जरुरी है। बाजार को ध्यान में रखे बिना किसी भी वस्तु का आर्थिक आधार पर उत्पादन उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस सभी बातों को ध्यान में रखते हुए हमें उपयुक्त मशीनें बनानी चाहिए। पर इसकी जगह आजकल हम देखते हैं कि हम मशीने पहले लगा लेते हैं और उसके बाद दूसरे कारकों का समन्वय करने की कोशिश करते हैं। विश्व के दूसरे देशों ने इस तरह से विकास नहीं किया। नहीं तो नई मशीनों में निवेश ही नहीं होता। हम मशीनों का आयात कर रहे हैं और इसलिए हमारे पास ज्ञान कम है। हमें भारतीय तकनीक का विकास करना होगा।

सातों ही कारकों परिवर्तनीय हैं। हर एक लगातार बदलता रहता है। योजना बनाने से जुड़ी लोगों को सोचना चाहिए कि परिवर्तन को विकास की तरफ कैसे मोड़ा जाए, शारीरिक कठिनाई को कैसे कम किया जाए, और ऊर्जा की बर्बादी को कैसे कम किया जाए। उदाहरण के लिए हम हमारे कामगारों की कम उत्पादकता को लेते हैं। इसे मशीनों के प्रयोग से बढ़ाया जा सकता है और ऐसा करना जरूरी भी है। लेकिन अगर मशीन को चलाने के लिए बहुत कम लोगों की जरुरत होगी तो बाकि बचे लोगों को नौकरी से निकाल दिया जाएगा।

अगर दूसरे देशों से इतनी मंहगी मशीनों को आयात करना पड़े कि अतिरिक्त उत्पादन करने के बाद भी आर्थिक रुप से फायदा नहीं हो तो इस तरह की मशीनें हमारी जरुरतों के लिए सही नही हैं। जैसे किसी कारखाने की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं होना घाटे का सौदा है वैसे ही इस देश के लोगों का बेरोजगार रहना भी घाटे का सौदा है।

शायद, इससे भी बुरा हो सकता है। मशीन में सिर्फ पूंजी लगती है जबकि बरोजगार व्यक्ति को भोजन की जरुरत होती है और दुगनी तेजी से संसाधन समाप्त होते हैं। इसलिए हमेशा के उपदेश कि “हर कामगार को भोजन मिलना चाहिए” , हमें “जो कोई भी खाता है उसे काम मिले” को हमारी अर्थव्यवस्था का आधार बनाने के बारे में विचार करना चाहिए। कोई शक नहीं कि चरखे को मशीने हटा देंगी लेकिन जरुरी नहीं कि हर जगह स्वचालित मशीनों का उपयोग किया जाए। सबको रोजगार देने प्राथमिक से ध्यान देना चाहिए और शेष छ: कारक उसके बाद पूरे किए जा सकते हैं।

अर्थव्यवस्था में व्यक्ति का स्थान

मानव श्रम का प्रयोग और रोज़गार का प्रश्न इन पर पूरे मानवता के संदर्भ में , एकात्म स्वरुप में सोचा जाना चाहिए। पिछली कुछ शताब्दियों में आए आर्थिक सिद्धांत और उन सिद्धांतों पर आधारित समाज की व्यवस्था के कारण मानव का पूरी तरह अवमूल्यन हुआ है। इस आर्थिक व्यवस्था में उसका व्यक्तित्व पूरी तरह से अप्रासंगिक हो गया है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था केवल “आर्थिक व्यक्ति” को पहचानती है, जिसके निर्णय पूरी तरह से हानि और लाभ की गणना पर टिके हैं। इस आर्थिक व्यक्ति के लिए, पांच रुपये हमेशा चार रुपये से ज्यादा होते हैं।

वह ज्यादा से ज्यादा धन कमाने के लिए अकेले ही काम करता है। उसके लिए मानव श्रम भी दूसरी वस्तुओं की तरह ही है , जिसे बाजार में खरीदा और बेचा जा सकता है। यह मुक्त उद्यम है। प्रतिस्पर्धा की रुकावट के अलावा यह दूसरी सभी बाधाओं और नियंत्रणों को अन्यायपूर्ण मानता है। यह एक दौड़ है, जिसमें कोई रुक कर पीछे छूट गए कमजोर व्यक्ति की सहायता नहीं करना चाहता, कमजोर के उन्मूलन को सही और स्वाभाविक समझा जाता है।

माना जाता है कि वह अनार्थिक, सीमान्त इकाई है, जिसे नष्ट होना चाहिए। यह इस बात की वकालत करता है। इस तरह की सीमान्त इकाईयों के नष्ट होने से आर्थिक ताकत कुछ लोगों के हाथों में सीमित हो जाती है। पूंजीवादी व्यवस्था में इसे स्वाभाविक और सामान्य समझा जाता है। लेकिन जब एकाधिकार स्थापित हो जाए और प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जाती है। तो इस तरह की स्थिति में प्रतिस्पर्धा के कारण होने वाले लाभ नहीं मिल पाते। मूल्य मनमाने तरीके से निर्धारित किए जाते हैं और उत्पादों की गुणवत्ता घटती है।

यहां तक की ग्राहक की आवश्यकता के मामले में भी पूंजीवाद ग्राहक की आवश्यकता और इच्छा से नहीं बल्कि खरीदने की क्षमता के हिसाब से नियंत्रित होता है। गरीबों और भूखों की बजाए अमीरों की जरुरतों का ध्यान रखा जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि जहां अमीरों के लिए असंख्या चीजों का उत्पादन किया जाता है, वहीं गरीबों को न्यूनतम जरुरत की चीजें भी नहीं मिल पाती। केन्द्रीकरण और एकाधिकारवाद के कारण ग्राहक का प्रभाव बहुत घट जाता है।

बाजार इतना संगठित हो गया है कि ग्राहक को मानक उत्पाद ही लेने पड़ते हैं। मानकीकरण इस हद तक बढ़ गया है कि ग्राहक की व्यक्तिगत पसंद पर ध्यान नहीं दिया जाता । पुस्तकालय में रखी किताबों की तरह ग्राहकों को भी नंबर दे दिए जाते हैं। विडम्बना यह है कि जिस व्यवस्था को व्यक्ति को सबसे ज्यादा महत्व देने के लिए बनाया गया था उसी ने निजी व्यक्तित्व को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। साफ है कि पूंजीवादी व्यवस्था मानव का संपूर्ण विकास करने में सफल साबित नहीं हुई है।

समाजवादी व्यवस्था एक प्रतिक्रिया है

पूंजीवाद के विरोध में समाजवाद आया। लेकिन समाजवाद भी व्यक्ति का महत्व स्थापित नहीं कर पाया। समाजवादी पूंजी का अधिकार राज्य के हाथ में देने मात्र से ही संतुष्ट हैं। लेकिन राज्य तो बहुत अव्यक्तिगत संस्था है। राज्य के सभी काम विधि विधान और नियमों से चलते हैं। सामान्यत: वहां व्यक्तिगत विवेक के लिए स्थान नहीं होता और अगर होता भी है तो प्रशासन की कर्तव्य और सामाजिक दायित्व को पूरा करने में में हुई जरा सी चूक से भ्रष्टाचार और पक्षपात को बढ़ावा मिल जाता है। पूंजीवादी व्यवस्था में व्यक्ति के सिर्फ आर्थिक पक्ष की बात की जाती है, और दूसरे क्षेत्रों में उसे मुक्त छोड़ दिया जाता है, जहां वह अपने निजी व्यक्तित्व के अनुसार काम कर सकता है।

समाजवादी व्यवस्था और भी आगे जाकर मात्र निराकार व्यक्ति की बात करती है। उसके बाद अलग-अलग रुचि और क्षमता के अनुसार निजी व्यक्तित्व के विकास के लिए जगह ही नहीं बचती है। व्यक्ति की आवश्यकताएं और रुचि समाजवादी व्यवस्था में उतना ही महत्व रखती हैं जितना कि किसी जेल में। समाजवादी व्यवस्था में निजी स्वतंत्रता जैसी कोई बात नहीं है।

व्यक्ति पर राज्य का दावा

एक समाजवादी समाज में निजी संपत्ति नहीं होती। इसलिए निजी संपत्ति के कारण होने वाली समस्याओं से वह मुक्त है। हालंकि, अर्थव्यवस्था में संसाधनो का उपयोग, उत्पादन और संरक्षण को प्रोत्साहन निजी संपत्ति की भावना के साथ मिलता है। लेकिन यहां इसके संरक्षण की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई है। राज्य को सभी मामलों में एकमात्र और सर्वोच्य बना दिया गया है। एक नागरिक इस बड़े से पहिए के दांते से ज्यादा कुछ नहीं है।

व्यक्ति को अपना काम पूरा करने के लिए प्रेरित करने की कोई व्यवस्था नही है। जैसा कि डिजीलस ने कहा, पुराने तरीके के शोषक वर्ग को समाप्त कर दिया गया है,लेकिन नौकरशाही के रुप में नया शोषक वर्ग पैदा हो गया है। कार्ल मार्क्स ने अपने इतिहास के विश्लेषण में कहा, कि पूंजीवाद में स्वंय के विनाश के बीज निहित हैं। और साम्यवाद पूंजीवाद का स्वाभाविक और अपरिहार्य उत्तराधिकारी है।

साम्यवाद की अंतिम विजय का भरोसा पैदा करने के लिए यह विचार अच्छा है लेकिन इस तरह की सोच से व्यक्ति की बदलाव की प्रेरणा और गतिशीलता समाप्त हो जाती है। वह अब नई व्यवस्था का निर्माता नहीं है, वह पहले से निर्धारित ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा मात्र है। उसका काम बस इस प्रक्रिया को बनाए रखना है। इसलिए, वह कामगारों को संगठित तो करता है लेकिन उनके हित को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं होता और उन्हें मात्र क्रांति के औजार के रुप में इस्तेमाल करता है।

मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद भी तब तक ही काम करता है जब तक कि पूंजीवाद की समाप्ति के बाद राज्य सर्वोच्य नहीं बन जाता। उसके बाद, राज्य द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के क्रियान्वन को रोक देता है। प्रतिक्रांति को रोकने और दबाने के नाम पर राज्य अधिकाधिक निरंकुश बन जाता है। एक दिन राज्य हट जाएगा और राज्यविहीन समाज का निर्माण होगा यह विचार मात्र एक सपना बन कर रह जाता है। असल में मार्क्स के विचारानुसार, इन प्रतिक्रियाओं की प्रकिया को रोकना अपने आप में प्रतिक्रियावादी है। इस तरह मार्क्स खुद अपने ही दर्शन को झुठला रहे हैं।

दोनों ही व्यवस्था, पूंजीवाद और साम्यवाद, व्यक्ति के सही और पूरे व्यक्तित्व और उसकी आकांक्षाओं को समझने में विफल रही हैं। एक उसको मात्र स्वार्थी प्राणी मानता है जो पैसे के पीछे है, जहां सिर्फ एक ही कानून है,तगड़ी प्रतियोगिता का कानून, संक्षेप में कहें तो जंगल का कानून, वहीं दूसरी तरफ उसे पूरी व्यवस्था का बेजान दांता समझा जाता है, कठोर नियमों के नियंत्रित किया जाता है और माना जाता है बिना बताए वह कुछ नहीं कर सकता। दोनों ही व्यवस्थाओं में सत्ता, अर्थव्यवस्था और राजनीति केन्द्रीकरण होता है। इसलिए दोनों में मानव का अमानवीकरण हो जाता है।

भगवान का सबसे अच्छा निर्माण, मानव ही अपनी पहचान खो रहा है। हमें मानव को फिर से उसकी सही जगह पर स्थापित करना होगा, उसे उसकी महानता का भान कराना होगा, उसकी क्षमताओं को जगाना होगा और इसे दिव्य ऊंचाईयों पर पहुंचने के लिए प्रेरित करना होगा। यह विकेन्द्रीत अर्थव्यवस्था से ही संभव है।

हमें ना तो पूंजीवाद चाहिए और ना साम्यवाद। मानव की प्रगति और खुशी ही हमारा उद्देश्य है।

दोनों व्यवस्थाओं के समर्थक राज्य में मानव को लेकर लड़ रहे हैं। लेकिन दोनों ही ना तो मानव को समझते हैं, ना ही उसके हितों की चिंता करते हैं।

हमारी आर्थिक व्यवस्था

हमारी अर्थव्यवस्था के निम्न उद्देश्य होने चाहिए

प्रत्येक व्यक्ति को न्यूनतम जीवन स्तर की आश्वस्ति और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए तैयारी।
इस न्यूनतम स्तर से इतना ऊपर उठना कि व्यक्ति और राष्ट्र अपनी चिति के आधार पर विश्व की प्रगति में योगदान कर सकें।
प्रत्येक सबल व्यक्ति को रोजगार का अवसर देना जिससे ऊपर बताए दोनों लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके और प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी और अपव्यय के बचना
उत्पादन के विभिन्न कारकों की उपलब्धता ( सात ‘M’s)और प्रकृति को ध्यान में रखकर भारतीय स्थितियों के अनुसार मशीनों का विकास ( भारतीय तकनीक)।
यह व्यवस्था मानव की अवहेलना करने की बजाए उसकी सहायता करे। यह जीवन की संस्कृति और दूसरे मूल्यों की रक्षा करे। यह ऐसी जरुरत है जिसकी भयानक आपदा के अवसर को छोड़कर अवहेलना नहीं की जा सकती
स्वामित्व, राज्य, निजी या किसी दूसरे तरह के उद्योग का निर्णय व्यावहारिक आधार पर किया जाना चाहिए।
ये कुछ सामान्य दिशा निर्देश हैं जिनका ध्यान अर्थव्यवस्था के विकास के दौरान रखा जाना चाहिए। “स्वदेशी” और “विकेन्द्रीकरण” ये दो शब्द हैं जो वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त आर्थिक व्यवस्था को संक्षेप में सामने रखते हैं। जाने अनजाने में केन्द्रीकरण और एकाधिकारवाद पिछले कुछ वर्षों में सामान्य बात बन गए हैं। योजनाकार इस विश्वास में बंध कर रह गए है कि बड़े पैमाने पर केन्द्रीकृत उद्योग ही आर्थिक रुप से सही हैं और इसलिए इसके दुष्परिणामों की चिंता किए बिना या जानबूझकर लेकिन असहाय होकर, वे उसी दिशा में बढ़ते जा रहे हैं।

यही हाल “स्वदेशी” का भी है । “स्वदेशी” के विचार को पुराने जमाने का और प्रतिक्रियावादी माना जाता है। हम गर्व के साथ विदेशी सामान का प्रयोग करते हैं। हम आजादी के बाद से ही हमारी सोच, प्रबंधन, पूंजी, उत्पादन के तरीकों, तकनीक आदि से लेकर उपभोग के तरीको में भी विदेशी सहायता पर ही निर्भर हैं। यह प्रगति और विकास का रास्ता नहीं है। हम स्वंय को भूल कर फिर से आभासी गुलाम बन जाएंगें। स्वदेशी के सकारात्मक विचार को अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के आधार के रुप में प्रयोग किया जाना चाहिए।

समय की कमी के कारण, मैं आर्थिक व्यवस्था के प्राकृतिक तत्वों पर बात नहीं की है। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि बहुत सी पुरानी संस्थाएं बदलेंगी और उनकी जगह नई संस्थाएं आयेंगी। पुरानी संस्थाओं से जिनके निहित स्वार्थ जुड़े हैं वे लोग बुरी तरह प्रभावित होंगे। कुछ लोग जो स्वभाव से ही परिवर्तन विरोधी हैं उन्हें भी पुनर्निर्माण से परेशानी होगी। लेकिन रोग का इलाज दवाई से ही किया जाना चाहिए। कठिन मेहनत से ही ताकत आएगी। इसलिए हमें यथास्थिति को त्याग कर नवनिर्वाण करना होगा। पुनर्निर्माण के प्रति हमारे प्रयास पूर्वाग्रह से घिरे नहीं होने चाहिए और ना अतीत की विरासत के प्रति हमारे मन में उपेक्षा का भाव होना चाहिए। साथ ही साथ उन प्राचीन संस्थाओं और परंपराओं से चिपके रहने की कोई जरुरत नहीं है जो अपनी उपयोगिता खो चुके हैं। हमने विचार किया है कि परिवर्तन की दिशा क्या होगी।

पिछले चार दिनों में हमने मावनवाद के एकीकृत स्वरूप पर चर्चा की है। इसके आधार पर हम राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, समाजवाद, और वैश्विक शांति का भारतीय सांस्कृति के पारंपरिक मूल्यों के साथ समन्वय कर इन सभी आदर्शों पर एकीकृत रुप से विचार कर पाएंगे। इन विचारों के बीच संघर्ष को हटाया जा सकता है और वे एक दूसरे के पूरक बन सकते हैं। इस तरह “मानव अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा और जीवन के उद्देश्य को पा सकता है”।

यहां हमने दर्शन पर चर्चा की है। लेकिन भारतीय जन संघ के सदस्य मात्र दार्शनिक या शिक्षाविद नहीं हैं। हम भारतीय जन संघ के माध्यम से इस राष्ट्र को मजबूत, खुशहाल, और समृद्ध बनाने का संकल्प लेकर निकले हैं। इसलिए, इस आधार पर राष्ट्र पुनर्निर्माण के व्यावहारिक कार्यक्रम शुरु करने होंगे। हमने हमारी प्राचीन संस्कृति पर विचार किया है। लेकिन हम पुरातत्वेत्ता नहीं हैं।

हमने एक विशाल पुरातात्विक संग्राहलय का संरक्षक बनने का इरादा नहीं है। हमारा लक्ष्य मात्र संस्कृति की रक्षा नहीं है बल्कि उसे गतिमान बनाकर आज के समय के अनुकूल बनाना है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारा देश इस आधार पर मजबूती से खड़ा रहे और हमारा समाज स्वस्थ, प्रगतिशील और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने में समर्थ हो सके। हमें बहुत सी परंपराओं को समाप्त करना होगा और सुधार लाने होंगे जिससे हमारे समाज में एकता और मूल्यों का विकास हो सके।

हम उन परंपराओं को हटा देंगे जो इस प्रक्रिया में बाधा डालती हैं। मानव शरीर की अपनी सीमाएं हैं उनके लिए दुखी नहीं होना चाहिए। शरीर के किसी हिस्से में कैसर होने पर उसका ऑपरेशन करना ही पड़ता है। स्वस्थ अंग को काटने की कोई जरुरत नहीं होती। अगर आज हमारा समाज छुआछूत जैसे बुराईयों से ग्रसित है जो एक मनुष्य को दूसरे से कमतर दिखाती है और जिसके कारण राष्ट्र की एकता खतरे में है, तो हमें इस तरह की बुराईयों को मिटाना होगा।

हमें इस तरह की संस्थाएं खड़ी करनी होंगी जो हमारे भीतर कुछ करने की भावन को पैदा करें। जो हमें स्वकेन्द्रीत और स्वार्थी बनाने की जगह राष्ट्र सेवा की भावना भरे, और अपने बंधुओं के प्रति प्यार और आत्मीयता पैदा करे। इस तरह की संस्थाएं सही मायने में हमारी “चिति” को प्रतिबिंबित करेंगी।

“चिति” राष्ट्र की आत्मा है। वह शक्ति और ऊर्जा जिससे राष्ट्र गतिमान होता है उसे “विराट” कहते हैं और वह चिति से प्रवाहित होता है। एक राष्ट्र के जीवन में “विराट” का वही स्थान है जो शरीर में प्राण का होता है। जैसे ‘प्राण’ शरीर के विभिन्न अंगों में जान डालता है, बुद्धि का संचार करता है और शरीर व आत्मा को एक साथ रखता है, वही काम राष्ट्र के लिए विराट करता है। सिर्फ मजबूत विराट के सहारे भी लोकतंत्र सफल और सरकार प्रभावी हो सकती है । तब हमारे राष्ट्र की विवधता राष्ट्र की एकता में बाधक नहीं होगी।

भाषा, व्यवसाय आदि को लेकर अंतर सब जगह है। हालांकि, जब विराट जाग्रत होता है तो विभिन्नता के कारण संघर्ष नहीं होता और लोग शरीर के अंगो की तरह एक दूसरे का सहयोग करते हैं या एक परिवार की तरह रहते हैं।

हमें हमारे राष्ट्र के विराट को जगाना का कार्य करना होगा। आइए अपनी विरासत पर गर्व करते हुए, वर्तमान के यथार्थवादी आंकलन और भविष्य के लिए महान संभावना के साथ इस कार्य में जुट जाएं। हम आशा करते हैं कि यह देश प्राचीन समय की छाया नहीं बनेगा ना ही रुस या अमेरिका की नकल होगा।

हम सार्वभौमिक ज्ञान और हमारी विरासत का समर्थन करते हैं, हम ऐसा भारत बनाएंगे जो अतीत से भी अधिक गौरवशाली होगा। हर व्यक्ति अपनी छिपी संभावनाओं का विकास कर पाएगा और पूरी सृष्टि के साथ एकता की भावना रखेगा, एक स्थिति जो पूर्ण मानव से भी बढकर होगी और व्यक्ति ‘नर’ से नारायण बना जाएगा। यह हमारी संस्कृति का बाहरी दैवीय रुप है। चौराहे पर खड़ी मानवता के लिए यही हमारा संदेश है। भगवान हमें शक्ति दें कि हम इस कार्य में सफल हो सकें।

!भारत माता की जय !